मोहम्मद यूनुस के फैसले से बांग्लादेश में बढ़ा कट्टरपंथ, जमात-ए-इस्लामी पर से बैन हटाना बना संकट की जड़
बांग्लादेश इस समय हिंसा, अस्थिरता और बढ़ते कट्टरपंथ के गंभीर दौर से गुजर रहा है। देश में बिगड़ते हालात के पीछे एक अहम फैसला बताया जा रहा है, जो अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने सत्ता संभालते ही लिया था। यह फैसला था कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी पर लगे प्रतिबंध को हटाना, जिसे अब बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति की जड़ के रूप में देखा जा रहा है।
शेख हसीना के पद छोड़ने और देश छोड़ने के बाद बनी अंतरिम सरकार ने 8 अगस्त 2024 को जमात-ए-इस्लामी पर से बैन हटा लिया। यूनुस सरकार ने इसे लोकतांत्रिक कदम बताते हुए कहा कि संगठन किसी आतंकी गतिविधि में शामिल नहीं है और उसे राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार मिलना चाहिए। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह फैसला जमीनी हकीकत और ऐतिहासिक अनुभवों को नजरअंदाज कर लिया गया।
जमात-ए-इस्लामी को बैन करने का फैसला इससे पहले 1 अगस्त 2024 को तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने लिया था। छात्र कोटा आंदोलन के दौरान हुई भीषण हिंसा में 150 से अधिक लोगों की मौत के बाद सरकार ने जमात और उसके छात्र संगठन इस्लामी छत्र शिबिर पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगाया था। सरकार का आरोप था कि यह संगठन हिंसा फैलाने में सीधे तौर पर शामिल रहा है।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास बांग्लादेश में हमेशा विवादों से जुड़ा रहा है। इसकी स्थापना 1941 में हुई थी और इस पर पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान जमात पर पाकिस्तानी सेना का साथ देने और युद्ध अपराधों में शामिल रहने के गंभीर आरोप लगे थे। इन्हीं कारणों से 2013 में बांग्लादेश की अदालत ने इसके संविधान-विरोधी चरित्र को देखते हुए इसे चुनाव लड़ने से भी रोक दिया था।
बैन हटने के बाद जमात-ए-इस्लामी को एक बार फिर खुली राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का मौका मिला। इसके बाद ढाका सहित कई इलाकों में संगठन की बड़ी रैलियां हुईं और कट्टरपंथी गतिविधियों में तेजी देखी गई। मानवाधिकार संगठनों और अल्पसंख्यक समुदायों का आरोप है कि इससे देश में धार्मिक तनाव बढ़ा और सबसे ज्यादा असर हिंदू अल्पसंख्यकों पर पड़ा।
आंकड़ों के मुताबिक, 4 से 20 अगस्त 2024 के बीच देश में हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं। इस दौरान 2,010 हमले दर्ज किए गए, 1,705 परिवार प्रभावित हुए, 157 घर और दुकानों में लूटपाट या आगजनी हुई और करीब 152 मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया। इन घटनाओं ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल के महीनों में हुई कई हत्याओं और लिंचिंग की घटनाओं ने भी हालात को और भयावह बना दिया है। कभी हिंदू युवक दीपू दास और सम्राट की हत्या की खबर सामने आती है, तो कभी मुसलमान युवक उस्मान हादी की जान जाती है। विश्लेषकों का कहना है कि यह हिंसा केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा समाज इसकी चपेट में आ गया है।
आलोचकों का मानना है कि मोहम्मद यूनुस द्वारा जमात-ए-इस्लामी पर से प्रतिबंध हटाने का फैसला एक बड़ी राजनीतिक भूल साबित हुआ है। जिस कदम को लोकतंत्र के नाम पर उठाया गया, उसने कट्टरपंथी ताकतों को फिर से संगठित होने का मौका दे दिया। नतीजतन, देश में कानून-व्यवस्था कमजोर पड़ी, सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा और बांग्लादेश एक बार फिर धार्मिक और राजनीतिक अस्थिरता के दौर में फंस गया है।