अहमदाबाद रथयात्रा में डीजे की आवाज से बेकाबू हुआ हाथी, भगदड़ मच गई, वन विभाग ने किया शांत
अहमदाबाद की प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथयात्रा में शुक्रवार को उस समय अफरा-तफरी मच गई जब 17 हाथियों के काफिले में सबसे आगे चल रहा एक नर हाथी अचानक बेकाबू हो गया। घटना सुबह करीब 10 बजे खाड़िया क्षेत्र में हुई, जब तेज डीजे और सीटी की आवाज से घबराकर हाथी 100 मीटर तक दौड़ पड़ा। रथयात्रा के दौरान जब यह हाथी बेकाबू हुआ तो उसने सबसे पहले अपने महावत को नीचे गिरा दिया। इसके बाद वह तेजी से दौड़ते हुए सड़क पर लगे बैरिकेड्स तोड़ता गया और राह में खड़े कई लोगों को गिरा दिया। हालांकि, गनीमत रही कि किसी को गंभीर चोट नहीं आई। वन विभाग के अधिकारी आर.के. साहू ने बताया कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पास ही मौजूद दो मादा हाथियों को लाया गया। नर हाथी, मादा हाथियों की उपस्थिति से धीरे-धीरे शांत हुआ और उसे पास के एक सुरक्षित स्थान पर बांध दिया गया। अधिकारी ने कहा, “हाथी को शांत करने के लिए हाथी ही सबसे कारगर होता है, इसलिए मादा हाथियों को बुलाया गया।” घटना के बाद ऐहतियात के तौर पर तीन हाथियों – एक नर और दो मादा – को रथयात्रा से अलग कर दिया गया है। अब शेष 14 हाथी ही यात्रा में शामिल रहेंगे। यह फैसला श्रद्धालुओं और आयोजकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। अहमदाबाद के पशुपालन विभाग के उप निदेशक डॉ. सुकेतु उपाध्याय ने बताया कि 23 जून से सभी हाथियों की शारीरिक और मानसिक स्थिति की जांच की जा रही थी। हर हाथी को स्वास्थ्य प्रमाण पत्र जारी किया गया और उनकी देखभाल के लिए वेटरनरी टीम भी साथ में नियुक्त की गई थी। उन्होंने कहा कि यदि कोई हाथी तनाव में आता है या नियंत्रण खोता है, तो डार्ट गन से ट्रेंक्विलाइज़र (बेहोशी का इंजेक्शन) देने की व्यवस्था भी होती है। यह घटना रथयात्रा के इतिहास में अनोखी नहीं है। इससे पहले भी रथयात्रा में हाथियों की भूमिका हमेशा चर्चा में रही है।
1985 में एक हाथी ने मंदिर के दरवाजे पर खड़ी पुलिस वैन को सूंड़ से उठाकर फेंक दिया था।, 1993 में सुरक्षा के लिए भगवान के रथ पर बुलेटप्रूफ शीशे लगाए गए थे।, 1946 में सांप्रदायिक दंगों के बावजूद यात्रा निकाली गई थी, जहां भगवान को हाथी पर बैठाकर यात्रा कराई गई थी। इस बार की रथयात्रा की शुरुआत मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने पाहिंड विधि और सोने की झाड़ू लगाकर की। सुबह 7 बजे शुरू हुई यात्रा में हजारों श्रद्धालु मौजूद रहे। हादसे के बावजूद प्रशासन की सक्रियता से स्थिति नियंत्रण में रही और यात्रा बिना किसी बड़े व्यवधान के जारी रही।यह घटना एक चेतावनी है कि धार्मिक आयोजनों में शोर-शराबे के बीच जानवरों की मानसिक स्थिति और उनकी सुरक्षा को लेकर और अधिक सतर्कता बरतनी होगी। आयोजकों और प्रशासन के लिए यह सीख है कि परंपरा और तकनीक के संतुलन से ही उत्सव सुरक्षित और सफल हो सकते हैं।