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उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ समापन — दिल्ली-मुंबई से पटना तक घाटों पर छठ महापर्व में आस्था व उमंग की लहर l

उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ समापन — दिल्ली-मुंबई से पटना तक घाटों पर छठ महापर्व में आस्था व उमंग की लहर l

देशभर में चार-दिनीय पर्व छठ महापर्व आज सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर शांतिपूर्वक समापन को पहुँचा। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश के नदी-घाटों में तो धरती-आकाश तक श्रद्धा की झड़ी लगी हुई थी, वहीं राजधानी दिल्ली के यमुना तट से लेकर मुम्बई के प्रतिष्ठित घाट-समुद्र किनारों तक भक्तों की भीड़ ने छठ की महिमा को और ऊँचा कर दिया।

पटना-नालंदा के घाटों पर हजारों-हजारों भक्त ऊँघते प्रथम किरणों के साथ खड़े नदीनदी के पानी में जल में खड़े होकर मंत्रोच्चारण करते नजर आए।
दिल्ली के यमुना तट पर वाहतुक जाम और विशेष व्यवस्था ने इस व्यापक आयोजन की ओर संकेत दिया।

मुम्बई के जूहू बीच-घाट पर भी पूर्वांचल-बिहारी समुदाय ने घर से दूर-दूर आकर श्रद्धा के साथ पूजा-कार्य किया।

परंपरा, उल्लास, और प्रशासनिक तैयारी

छठ पूजा का मूल उत्सव चार दिन तक चलता है — पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन उषा (उगते सूर्य) को अर्घ्य।

इस वर्ष भी श्रद्धालुओं ने निर्जला व्रत, नदी-पार्श्व में पानी में खड़े होकर सूरज को अर्घ्य देने की परंपरा को जीवित रखा।

भोजन-प्रसाद में ‘ठेकुआ’, गन्ना, फल-फूल आदि विशेष स्थान लेते हैं — श्रद्धा और सांस्कृतिक स्वाद दोनों को समेटे।

प्रशासन ने भी पीछे नहीं खड़े रहे: दिल्ली में लगभग 17 मॉडल घाट बनाये गए, पार्किंग-वाटर-सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की गई।

रेलवे ने बिहार और अन्य क्षेत्रों के लिए विशेष ट्रेनों का प्रावधान किया ताकि पर्व-यात्रा सुचारु रहे।

सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

यह पर्व सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक-समुदाय को जोड़ने वाला अवसर भी बन गया है। महिलाएँ व्रत रखती हैं, परिवार-समाज के कल्याण की कामना करती हैं, और एक दूसरे के साथ मिलकर गीत-भजन करती हैं।

राजनीतिक पटल पर भी छठ महापर्व ने अहम स्थान पाया। नीतीश कुमार ने परिवार के साथ अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया, जिससे इस पर्व की सांस्कृतिक जड़ें और मज़बूत हुईं।

इस वर्ष के छठ संदर्भ में ध्यान देने योग्य एक पहलू है: दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में भी पूर्वांचल-बिहारी समुदाय की सक्रिय उपस्थिति ने इस पर्व को ‘क्षेत्रीय’ से ‘राष्ट्रीय’ स्तर पर ले जाने का संकेत दिया है।

आज की सुबह-तुड़के, नदी-घाट और तटों पर जागती तमाम श्रद्धांजलियों ने यह संदेश दिया कि छठ महापर्व सिर्फ एक पूजा-व्रत नहीं बल्कि संयम, आस्था, समर्पण और साझा-सामाजिक अनुभव का उत्सव है। जब श्रद्धालु उगते सूर्य को सम्मुख खड़े होते हैं, तो एक नया आरंभ, एक नया भरोसा और एक नया संकल्‍प भी जन्म लेता है।

भारत-विभिन्न भागों में झूली आस्था की धारा ने यह प्रमाणित किया कि पर्व-उत्सव केवल परंपराओं का पालन नहीं बल्कि एक सामूहिक झलक — संस्कृति की, भाव-विभाजन की, और नई पीढ़ी के बीच संवाद की — भी है।

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