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ऑस्कर विजेता एआर रहमान के दावे पर बवाल, विपक्ष ने कहा—भेदभाव कला के लिए खतरा

ऑस्कर विजेता एआर रहमान के दावे पर बवाल, विपक्ष ने कहा—भेदभाव कला के लिए खतरा

मशहूर संगीतकार एआर रहमान के हालिया बयान ने फिल्म इंडस्ट्री और सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। एक इंटरव्यू में ऑस्कर विजेता संगीतकार ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में पहले की तुलना में कम काम मिला है और इसके पीछे सत्ता में आए बदलाव के बाद रचनात्मक माहौल के कमजोर होने की बात कही। उन्होंने संकेतों में यह भी कहा कि इसमें धर्म और सांप्रदायिक सोच की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि उन्होंने किसी पर सीधे आरोप नहीं लगाया।

एआर रहमान के इस दावे पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसद इमरान मसूद की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। दोनों नेताओं ने इसे एक गंभीर मुद्दा बताया है, जिस पर समाज और सरकार को सोचने की जरूरत है।

मीडिया से बातचीत में अखिलेश यादव ने कहा कि उन्होंने एआर रहमान का पूरा इंटरव्यू नहीं सुना है, लेकिन वे उनके संगीत के बड़े प्रशंसक रहे हैं। उन्होंने कहा कि एआर रहमान ऐसे कलाकार हैं जिनके गाने रिलीज़ होने से पहले ही लोकप्रिय हो जाते थे। अखिलेश यादव ने जोर देकर कहा कि कला, संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में किसी भी कलाकार को भेदभाव की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे देश और दुनिया की साझा विरासत होते हैं।

वहीं, सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने एआर रहमान के बयान को बेहद गंभीर करार दिया। उन्होंने कहा कि अगर कोई ऑस्कर विजेता कलाकार यह महसूस कर रहा है कि उसे धर्म या सांप्रदायिक कारणों की वजह से अपने ही देश में कम काम मिल रहा है, तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। इमरान मसूद ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

इमरान मसूद ने इस बहस को व्यापक संदर्भ में रखते हुए कहा कि एक ओर देश के भीतर नफरत और विभाजन की बातें सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर विदेशों में, खासकर बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ती हिंसा, भी चिंता का कारण है। उनके मुताबिक, यह माहौल रचनात्मकता और सामाजिक सौहार्द दोनों के लिए नुकसानदायक है।

पूरा विवाद उस इंटरव्यू के बाद गहराया, जिसमें एआर रहमान ने कहा कि पिछले करीब आठ सालों में हिंदी सिनेमा में उन्हें अपेक्षाकृत कम अवसर मिले हैं। उन्होंने इसे बदलते पावर स्ट्रक्चर, रचनात्मक समझ की कमी और संभावित सांप्रदायिक सोच से जोड़ा। साथ ही उन्होंने अपने शुरुआती करियर का जिक्र करते हुए बताया कि ‘रोजा’, ‘बंबई’ और ‘दिल से’ जैसी सुपरहिट फिल्मों के बावजूद उन्हें कभी-कभी बाहरी जैसा महसूस होता था। बाद में सुभाष घई की फिल्म ‘ताल’ के बाद उन्हें व्यापक स्वीकार्यता मिली।

एआर रहमान के इन बयानों के बाद जहां एक ओर विपक्षी नेता इसे गंभीर सामाजिक समस्या बता रहे हैं, वहीं भाजपा नेताओं ने उनके दावों का विरोध किया है। फिलहाल यह मुद्दा कला, धर्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक बड़े विमर्श का रूप ले चुका है।

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