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पैदल घर जा रहे प्रवासी मजदूरों को हम कैसे रोके – सुप्रीम कोर्ट

पैदल घर जा रहे प्रवासी मजदूरों को हम कैसे रोके – सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली-सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रवासी श्रमिकों को उनके घर वापस भेजने की याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। वकील अलख आलोक श्रीवास्तव ने प्रवासी मजदूरों की ट्रेन और सड़क दुर्घटनाओं में हुई मौतों का हवाला देते हुए ये याचिका दायर की थी। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अदालत अखबार की खबरों के आधार पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती, मामले में राज्यों को कार्रवाई करनी चाहिए। पीठ ने कहा भला हम इसे कैसे रोक सकते हैं।

बता दें कि कोरोना और लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों को जान जोखिम में डालते हुए भूखे पेट ही मिलों का सफर तय करना पड़ रहा है। पुलिस-प्रशासन भी उनकी पीड़ा को सुनने के बजाए उन्हें लाठियां फटकार कर इधर से उधर दौड़ा रहा है। भूखे-प्यासे ये प्रवासी मजदूर मजबूरन जंगलों और खेतों के रास्ते से ही पैदल सफर कर रहे है। जिससे उनके साथ कभी भी कोई अप्रिय घटना घटित हो सकती है। बल्कि कई सड़क दुर्घटनाओं में मजदूरों ने जान भी गंवाई हैं।

लॉकडाउन ने सबसे अधिक कमर अगर किसी की तोड़ी है तो वे है दिहाड़ी और कंम्पनियों में काम करने वाले मजदूरों की। जैसे ही लॉकडाउन घोषित हुआ, तो उनका रोजगार छीन गया और वे बेरोजगार हो गए। जैसे-तैसे कर कुछ दिन तो उन्होंने काट लिए, लेकिन अब उनके पास नकदी खत्म हो गई और उनके समक्ष दो जून की रोटी के भी लाले पड़ने शुरू हो गए।

प्रशासन ने प्रवासी मजदूरों को इस दर्द से उबारने के लिए जगह-जगह आश्रय स्थल खुलवाए। उनमें उनके ठहरने और खान-पान की व्यवस्था कराई। उन्हें घर पहुंचाने के लिए बस सेवा भी शुरू कराई, लेकिन यहां भी लाचार और बेबस मजदूरों का दुर्भाग्य ने पीछा नहीं छोड़ा। प्रवासी मजदूरों का आरोप है कि पहले हरियाणा के प्रशासन ने उनके साथ ज्यादती की और रही सही कसर बागपत के पुलिस प्रशासन ने पूरी कर दी। वे हरियाणा बॉर्डर पर मदद की गुहार लगाते हुए पहुंचे, तो हरियाणा के अधिकारियों ने उन्हें वहां से भगा दिया। वे हरियाणा से यमुना नदी को पार कर बागपत पहुंचे, तो यहां के प्रशासन ने भी उन्हें वापस लौट जाने के निर्देश दे दिए।

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