यूपी में ब्राह्मण‑यादव रेखा खींचने की सियासी कोशिश या अफसूसी सांस्कृतिक टकराव ?
उत्तर प्रदेश के इटावा में हाल ही में एक कथावाचक के साथ हुई हिंसात्मक घटना ने फिर से ब्राह्मण‑यादव तनाव के आरोपों को हवा दे दी है। लेकिन क्या सच में जातिगत अंतर्विरोध है, या फिर इसे सियासी रंग दे कर बढ़ाया जा रहा है? 25 जून को इटावा के अहेरीपुर गांव में एक यादव कथावाचक की बेरहमी से पिटाई की गयी। आरोप है कि कुछ ब्राह्मणों ने उसकी सिर मुंडवाई, नाक ज़मीन से रगड़वाई और सार्वजनिक रूप से माफी दिलवाई। जैसे ही चर्चा बढ़ी, ‘अहीर रेजिमेंट’ के समर्थक बड़ी संख्या में गांव पहुंचने लगे। जब पुलिस ने रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने पथराव शुरू कर दिया, जिसमें पुलिस को प्रतिरोध करना पड़ा। इस घटना को सीधे तौर पर जातिगत संघर्ष कहना जल्दबाज़ी होगी। ब्राह्मण अब उतने प्रभावी या बड़े नहीं रह गए हैं, जितना माना जाता था। समाजवादी और यादव समुदाय ने 2000 के बाद काफी राजनीतिक व सामाजिक दबदबा हासिल किया है। यूपी की सड़कों पर समाजवादी पार्टी की झंडे वाली गाड़ियाँ कहीं ज़्यादा नज़र आती हैं, जबकि बीजेपी की गाड़ियाँ अपेक्षाकृत कम हैं। इसलिए सिर्फ यह मान लेना कि ब्राह्मणों ने अपने अधिकार दिखाने के लिए इतनी हिंसा की, उचित नहीं लगेगा। बीजेपी ने पिछले आठ साल में ‘ठाकुर‑ब्राह्मण एकता’ और सत्ता को जोड़कर प्रचारित किया, लेकिन फिर भी ब्राह्मणों को लगता रहा कि वे उपेक्षित हैं। सपा‑यादव गठजोड़ को इसका सीधा लाभ मिला – महाराजगंज, इटावा जैसे इलाकों में यादव‑ब्राह्मण समर्थन को जोड़ा गया। इस घटना को नए तरीके से पेश कर सपा ने ब्राह्मण विरोध का नारा गढ़ा, जबकि बीजेपी इसे समाज में अराजकता बताकर दिखाना चाह रही है। इस घटना का झंडा जातिगत रंग में लपेटा जाना लुभावना नज़ारा है, लेकिन गहराई में उतना बुनियादी नहीं। उत्तर प्रदेश की सत्ता‑संगठित राजनीति में आज जाति से ज़्यादा, जमीनी ताक़त तथा सामाजिक गठजोड़ मायने रखते हैं। पिछड़े‑मान्यता प्राप्त जातियों का प्रभाव अब मैदान पर स्पष्ट दिख रहा है – वे न केवल प्रमुख वोटबैंक हैं, बल्कि स्थानीय शासन, पुलिस, प्रशासन और नेटवर्क पर भी उनकी पकड़ है। तो सवाल यह है: क्या हम इस घटना को सिर्फ जातिगत रूपक मानकर जांच को गुमराह करेंगे, या राजनीतिक हितों पर सच्चाई को देखेंगे?