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“रूस-यूक्रेन जैसी लम्बी लड़ाई के लिए Ministry of Defence ने तैयारी तेज की: नए Defence Procurement Manual 2025 में गोला-बारूद की दस साल तक की आपूर्ति और निजी कंपनियों को खुला रास्ता”

“रूस-यूक्रेन जैसी लम्बी लड़ाई के लिए Ministry of Defence ने तैयारी तेज की: नए Defence Procurement Manual 2025 में गोला-बारूद की दस साल तक की आपूर्ति और निजी कंपनियों को खुला रास्ता”

देश की सुरक्षा स्थितियों में बदले माहौल को देखते हुए भारत की सशस्त्र सेनाओं ने लंबे समय तक संघर्ष के लिए रणनीतिक तैयारी शुरू कर दी है। रक्षा मंत्रालय ने ऐसा संकेत देते हुए हाल ही में “Defence Procurement Manual 2025” जारी किया है, जिसमें कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं — खासकर गोला-बारूद एवं अन्य तात्कालिक सामग्री की खरीद-प्रक्रिया को आधुनिक रूप देने हेतु।

क्या है नया बदलाव?
इस नए मैनुअल के अनुसार, अब सेनाओं को निजी कंपनियों से सीधे गोला-बारूद, म्यूनिशन और अन्य आपूर्ति लेने का अवसर मिला है — जिससे उनकी निर्भरता केवल सरकारी होल्डिंग्स पर नहीं रह जाएगी।

इसके अंतर्गत पुराने नियम में जो Ordnance Factory Board से अनुमति लेने की अनिवार्यता थी, उसे समाप्त कर दिया गया है—जिससे निजी क्षेत्र में तेजी से प्रतिपूर्ति क्षमता बढ़ सकेगी।

मैनुअल का उद्देश्य है कि भारत की सशस्त्र सेनाएँ अन्य युद्ध-परिस्थितियों की तरह लंबे समय (10 साल या उससे अधिक) तक की लड़ाई की स्थिति में भी गोला-बारूद-भण्डारण एवं आपूर्ति-शृंखला में पिछड़ न जाएँ।

रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने इस बदलाव को सैनिक तैयारियों को और सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि अब रेडीनेस – तैयार रहने – का स्तर और ऊँचा होगा।

विश्व में हाल-फिलहाल देखें तो Russia–Ukraine War, मध्य-पूर्व के संघर्ष और अन्य साथियों की आपूर्ति-चाल चुनौतियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लंबे युद्द में गोला-बारूद की कमी देश की युद्धक्षमता को कमजोर कर सकती है।

भारत-पाकिस्तान व भारत-चीन सीमाओं पर बने तनाव के कारण भारतीय सेनाओं को यह एहसास हुआ है कि ‘तीव्र लड़ाई’ से बढ़कर दीर्घकालीन मुकाबला की तैयारी करना अब अनिवार्य है।

इसलिए पुरानी “इमरजेंसी खरीद” मॉडल से निकलकर, अब नियमित और योजनाबद्ध आपूर्ति-शृंखला बनाना प्राथमिकता बन गई है।

थोक में म्यूनिशन तैयार करने तथा निजी कंपनियों को भागीदार बनाने से, आपूर्ति-शृंखला में गति आएगी और विविध स्रोत तैयार होंगे।

इससे युद्ध की स्थिति या उत्स्फूर्त लड़े में जल्दी आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी — विशेषकर 105 मिमी, 130 मिमी, 155 मिमी होवित्जर गोले, मोर्टार राउंड आदि में।

निजी क्षेत्र को शामिल करके “मेक इन इंडिया” का उद्देश्य और बढ़ेगा — जिससे आयात-निर्भरता कम होगी और विदेशी आपूर्ति-शंकाओं से बचाव होगा।

निजी कंपनियों को उच्च गुणवत्ता, युद्ध-मानक के अनुरूप उत्पादन, समय-बद्धता और प्रमाणन सुनिश्चित करना होगा — वरना आपूर्ति ठप पड़ सकती है।

10 साल तक चलने वाली आपूर्ति योजना में वित्त-नियोजन, भण्डारण, लाइफ-साइकल मैनेजमेंट, पुरानी गोला-बारूद के स्थानांतरण जैसे पहलुओं को संभालना होगा।

इस बदलाव के चलते सरकारी और निजी क्षेत्र में समन्वय, नियंत्रण एवं निगरानी-प्रणाली मजबूत होना अनिवार्य है।

अगले कुछ महीनों में इन नए नियमों के तहत कई निजी कंपनियों को म्यूनिशन व गोलाबारूद तैयार करने हेतु लाइसेंस तथा ठेके दिए जाने की संभावना है।

सेनाओं को इन आपूर्ति-शृंखलाओं का वास्तविक परीक्षण युद्ध-अनुवर्ती अभ्यासों में करना होगा, ताकि “लंबे युद्ध” की स्थिति में कार्यप्रणाली तैयार हो।

सरकार को नियमित रूप से इस व्यवस्था की समीक्षा करनी होगी — चाहे वह निर्माण-उपकरण हो, आपका मूल्यांकन हो, या तेल-गोला-भण्डारण के संसाधन हों।

इस प्रकार, भारत ने अपनी सुरक्षा नीति में स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब उच्च-तीव्रता के मुकाबले से आगे की सोच अपनाई जा रही है — जहाँ “लंबे युद्ध के लिए तैयार” होना रणनीतिक जरूरत बन चुका है। यह बदलाव न सिर्फ हमारी प्रतिरक्षा क्षमता को मजबूत करेगा, बल्कि निजी उद्योग को भी एक-नई भूमिका में ले आएगा और भारत को आगामी दशकों में आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की दिशा में अग्रसर करेगा।

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