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15 साल की पीड़िता का दर्द देख भावुक हुआ कोर्ट, सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा बयान

15 साल की पीड़िता का दर्द देख भावुक हुआ कोर्ट, सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा बयान

सुप्रीम कोर्ट में नाबालिग रेप पीड़िता के गर्भपात से जुड़े एक संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत भावुक नजर आए और उन्होंने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि किसी भी पीड़िता पर अनचाही प्रेग्नेंसी नहीं थोपी जा सकती। अदालत ने साफ कहा कि 15 साल की बच्ची की प्रेग्नेंसी को लेकर अंतिम फैसला उसी और उसके माता-पिता का होना चाहिए, जिसमें मेडिकल विशेषज्ञ उनकी मदद कर सकते हैं।

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने सरकारी वकील से कहा कि इस बात पर विचार किया जाए कि इतनी कम उम्र की बच्ची ने कितना दर्द और मानसिक आघात सहा होगा। उन्होंने कहा कि यह बच्ची अभी पढ़ाई करने की उम्र में है, लेकिन उसे मां बनने के लिए मजबूर करना उसके साथ अन्याय होगा। अदालत ने जोर देकर कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शरीर पर अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS को निर्देश दिया कि वह पीड़िता और उसके परिवार की काउंसलिंग करे, ताकि वे सभी पहलुओं को समझते हुए सही निर्णय ले सकें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मेडिकल रूप से गर्भपात संभव है और इससे पीड़िता को स्थायी नुकसान नहीं होता, तो इस विकल्प पर विचार किया जा सकता है।

दरअसल, केंद्र सरकार ने पहले दिए गए आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी, जिसमें 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को समाप्त करने की अनुमति दी गई थी। सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि इस स्टेज पर गर्भपात कराना मेडिकल रूप से जोखिम भरा हो सकता है और नाबालिग के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने गोद लेने का विकल्प भी सुझाया।

हालांकि, कोर्ट ने सरकार की दलीलों पर असहमति जताते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में पीड़िता की इच्छा सर्वोपरि होनी चाहिए। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी कहा कि अदालत व्यक्तिगत पसंद का सम्मान करती है और सरकार को भी ऐसा ही करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान कानून में सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया। अदालत ने केंद्र से पूछा कि क्या रेप पीड़िताओं के मामलों में गर्भपात की समय सीमा को बढ़ाने के लिए मौजूदा कानूनों में बदलाव किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सख्त समय सीमा नहीं होनी चाहिए और कानून को समय के साथ लचीला बनाया जाना जरूरी है।

यह मामला न सिर्फ कानूनी बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महिलाओं के अधिकार और संवेदनशील मामलों में न्याय व्यवस्था के दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

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