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IAS रिंकू सिंह राही का ‘तकनीकी इस्तीफा’: सिस्टम पर उठाए बड़े सवाल

IAS रिंकू सिंह राही का ‘तकनीकी इस्तीफा’: सिस्टम पर उठाए बड़े सवाल

उत्तर प्रदेश कैडर के 2023 बैच के आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही इन दिनों अपने एक असामान्य फैसले को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सात पन्नों का “तकनीकी त्यागपत्र” भेजते हुए खुद को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) से मुक्त कर मूल प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) में वापस भेजने की मांग की है। राही का कहना है कि उन्हें पिछले कई महीनों से कोई ठोस जिम्मेदारी नहीं दी गई और बिना काम के वेतन लेना उनके नैतिक सिद्धांतों के खिलाफ है।

अपने पत्र में रिंकू सिंह राही ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एक समानांतर व्यवस्था (पैरलल सिस्टम) काम कर रही है, जिसमें ईमानदार अधिकारियों को सक्रिय रूप से काम करने का अवसर नहीं दिया जाता। उन्होंने बताया कि शाहजहांपुर में एसडीएम के रूप में सख्त कार्रवाई के बाद उन्हें साइडलाइन कर दिया गया और फिलहाल वे राजस्व परिषद में अटैच हैं, जहां उन्हें काम के बजाय केवल वेतन मिल रहा है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी यह मांग नियमों के तहत संभव नहीं है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन के अनुसार, IAS और PCS दो अलग-अलग सेवाएं हैं। IAS, संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से संचालित होती है, जबकि PCS राज्य सरकार के अधीन होती है। IAS में चयन के समय अधिकारी PCS सेवा से इस्तीफा दे देते हैं, इसलिए तकनीकी रूप से वापस PCS में लौटना संभव नहीं होता।

रिंकू सिंह राही का करियर संघर्ष और साहस का उदाहरण रहा है। उन्होंने वर्ष 2004 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर PCS अधिकारी के रूप में सेवा शुरू की थी। मुजफ्फरनगर में छात्रवृत्ति और पेंशन घोटाले का खुलासा करने के बाद उन पर जानलेवा हमला भी हुआ, जिसमें उन्हें गंभीर चोटें आईं और एक आंख की रोशनी खोनी पड़ी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और कई प्रयासों के बाद 2022 में IAS बनने का सपना पूरा किया।

इस मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मौजूदा सरकार में ईमानदार और सक्षम अधिकारियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है।

फिलहाल इस मामले पर राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। चूंकि यह मामला केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग (DoPT) और राष्ट्रपति के पास है, इसलिए अंतिम निर्णय वहीं से लिया जाएगा। हालांकि, उत्तर प्रदेश कैडर से जुड़े होने के कारण योगी आदित्यनाथ की सरकार की राय भी इस मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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