सऊदी का हाईटेक एयर डिफेंस कैसे हुआ बेअसर? रियाद एयरपोर्ट तक पहुंचीं हूतियों की मिसाइलें
सऊदी अरब की राजधानी रियाद में लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों ने देश की हवाई सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुनिया के अत्याधुनिक हथियारों और कई स्तरों वाली एयर डिफेंस प्रणाली से लैस सऊदी अरब के लिए यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों को रोकना बड़ी चुनौती बन गया है। रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट को लगातार निशाना बनाए जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि आखिर सऊदी अरब की मजबूत मानी जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद हमलावर उसके महत्वपूर्ण ठिकानों तक कैसे पहुंच रहे हैं।
10 अक्टूबर को हुए हमले में सऊदी अधिकारियों के मुताबिक 12 लोगों की मौत हुई और 309 लोग घायल हुए। इसके बाद घायल एक भारतीय नागरिक की मौत होने से इस हमले में जान गंवाने वालों की संख्या 13 हो गई। 11 अक्टूबर को एयरपोर्ट पर एक और हमला हुआ, जिसमें एक पाकिस्तानी नागरिक की मौत हो गई और 11 अन्य लोग घायल हुए। लगातार हुए इन हमलों के बाद एयरपोर्ट पर परिचालन रोकना पड़ा और सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा शुरू हुई। हूती विद्रोहियों ने इन हमलों की जिम्मेदारी भी ली है।
सऊदी अरब के पास हवाई हमलों से बचाव के लिए कई तरह की आधुनिक प्रणालियां हैं। इनमें बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने वाली इंटरसेप्टर प्रणालियां, रडार, निगरानी नेटवर्क और ड्रोन से निपटने की तकनीक शामिल हैं। देश ने अमेरिका और दूसरे देशों से उन्नत सैन्य उपकरण खरीदे हैं। लेकिन किसी देश के पास अत्याधुनिक एयर डिफेंस होने का अर्थ यह नहीं है कि वह हर मिसाइल या ड्रोन को सौ फीसदी रोक सकता है। किसी हमले को नाकाम करने के लिए खतरे की समय रहते पहचान, उसकी दिशा और गति का आकलन तथा सही समय पर इंटरसेप्टर दागना जरूरी होता है।
हूती विद्रोहियों के हमलों को चुनौतीपूर्ण बनाने वाला एक प्रमुख पहलू उनके पास मौजूद अलग-अलग तरह के हथियार हैं। बैलिस्टिक मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें और ड्रोन अलग-अलग ऊंचाई, गति और उड़ान के तरीके से लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। बैलिस्टिक मिसाइलें बेहद तेज गति से लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं, जबकि क्रूज मिसाइलें अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ सकती हैं। ड्रोन भी रडार की पकड़ और प्रतिक्रिया के लिहाज से चुनौती पैदा कर सकते हैं। ऐसे में एक ही तरह की रक्षा प्रणाली सभी खतरों से समान रूप से निपटने में सक्षम नहीं होती।
एक साथ बड़ी संख्या में मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल भी एयर डिफेंस पर दबाव बढ़ा सकता है। अगर कई दिशाओं से हमले किए जाएं, तो रडार और कमांड सिस्टम को एक साथ कई लक्ष्यों की पहचान और प्राथमिकता तय करनी पड़ती है। हमलावर पहले ड्रोन भेजकर रक्षा प्रणाली का ध्यान भटका सकते हैं और उसके बाद दूसरे हथियारों से हमला कर सकते हैं। रियाद हमले की शुरुआती जांच को लेकर सामने आई रिपोर्टों में भी ड्रोन के जरिए सुरक्षा घेरे को भेदने और उसके बाद मिसाइलों के इस्तेमाल की आशंका की जांच किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, हमले के दौरान वास्तव में क्या हुआ और सुरक्षा व्यवस्था में कहां चूक हुई, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। <Cite refs={[“turn253319news24″,”turn253319search0”]}/>
सऊदी अरब के सामने एक और चुनौती उसके विशाल भूभाग और महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा करना है। तेल प्रतिष्ठानों, पाइपलाइनों, सैन्य ठिकानों और हवाई अड्डों को एक साथ सुरक्षित रखना आसान नहीं है। एयर डिफेंस सिस्टम को हर जगह समान स्तर पर तैनात नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, किसी हमले को रोकने में रडार कवरेज, शुरुआती चेतावनी, हथियारों की उपलब्धता और अलग-अलग रक्षा प्रणालियों के बीच तालमेल की अहम भूमिका होती है। इसलिए किसी महत्वपूर्ण ठिकाने पर हमला हो जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि देश की पूरी हवाई सुरक्षा व्यवस्था विफल हो गई है, लेकिन यह उसकी कमजोरियों की जांच की जरूरत जरूर दिखाता है।
हूती विद्रोही इससे पहले भी सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश कर चुके हैं। सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था में तेल क्षेत्र की बड़ी भूमिका है, इसलिए तेल सुविधाओं पर हमलों से आर्थिक गतिविधियों और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ सकती है। रियाद एयरपोर्ट पर बार-बार हमले होने से आम यात्रियों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था में वास्तविक चूक कहां हुई और भविष्य में ऐसे हमलों को कैसे रोका जाएगा। क्या शुरुआती चेतावनी समय पर नहीं मिली, क्या हमलावरों ने कई तरह के हथियारों का इस्तेमाल करके रक्षा प्रणाली पर दबाव बनाया या अलग-अलग सुरक्षा प्रणालियों के बीच तालमेल में कमी रही—इन सवालों के जवाब जांच से सामने आ सकते हैं। इतना स्पष्ट है कि आधुनिक एयर डिफेंस के बावजूद ड्रोन और मिसाइलों के बदलते स्वरूप से निपटना लगातार कठिन होता जा रहा है और रियाद पर हुए हमलों ने इस चुनौती को एक बार फिर उजागर किया है।