
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही 2027 में होने हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अभी से चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। गोरखपुर में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के दो दिवसीय दौरे के दौरान संगठन और सरकार के वरिष्ठ नेताओं ने आगामी चुनाव की रणनीति पर मंथन किया। बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, यूपी प्रभारी विनोद तावड़े, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। चर्चा का केंद्र सिर्फ संगठन की मौजूदा स्थिति नहीं, बल्कि 2027 में जनता के बीच किन मुद्दों को लेकर जाना है, यह भी रहा।
बीजेपी की रणनीति में हिंदुत्व, कानून-व्यवस्था, जातीय समीकरण, युवा मतदाता और महिला लाभार्थियों को प्रमुखता देने की बात सामने आई है। इसके साथ ही योगी सरकार के करीब दस साल के कार्यकाल से जुड़ी संभावित एंटी-इनकंबेंसी से निपटने और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने पर भी विचार किया गया। पार्टी की कोशिश है कि सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर संगठन की सक्रियता बढ़ाई जाए।
चुनावी तैयारी में मतदाता सूची भी बीजेपी के लिए अहम मुद्दा है। पार्टी संगठन को बूथ स्तर पर मतदाता सूची की निगरानी करने और छूटे हुए पात्र मतदाताओं के नाम जुड़वाने के लिए सक्रिय रहने का संदेश दिया गया है। नए मतदाताओं के साथ उन लोगों तक भी पहुंच बनाने पर जोर है, जिनके नाम किसी कारण से सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं। इसके लिए बूथ अध्यक्षों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
बीजेपी की नजर खास तौर पर 30 साल से कम उम्र के युवा मतदाताओं पर है। युवाओं के बीच केंद्र और प्रदेश सरकार की योजनाओं, विकास कार्यों और धार्मिक स्थलों के विकास को प्रचार का हिस्सा बनाया जा सकता है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और मथुरा से जुड़े धार्मिक मुद्दों के साथ-साथ कानून-व्यवस्था और पिछली सरकारों के कार्यकाल की तुलना भी चुनावी विमर्श में शामिल हो सकती है। सपा और कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति करने के आरोप भी बीजेपी के प्रचार का हिस्सा बन सकते हैं।
धार्मिक मुद्दों के साथ कानून-व्यवस्था बीजेपी के चुनावी एजेंडे का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। पार्टी अयोध्या के राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और मथुरा से जुड़े विषयों को जनता के बीच उठा सकती है। इसके अलावा मुजफ्फरनगर दंगों और अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर विपक्ष को घेरने की रणनीति भी बनाई जा सकती है। ऐसे में 2027 के चुनाव में विकास के मुद्दों के साथ मंदिर-मस्जिद और सुरक्षा से जुड़ी बहस भी अहम हो सकती है।
महिला मतदाताओं और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंच बनाने पर भी पार्टी का जोर है। आवास, राशन, आर्थिक सहायता और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ पाने वाले परिवारों से सीधे संपर्क करने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। बीजेपी की कोशिश है कि केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की योगी सरकार की योजनाओं की जानकारी घर-घर तक पहुंचे और महिला मतदाताओं के बीच सरकार के कामकाज को लेकर संवाद बढ़े।
सोशल मीडिया पर विपक्ष के नैरेटिव का जवाब देना भी बैठक में चर्चा का विषय रहा। पार्टी अब विपक्ष के आरोपों पर प्रतिक्रिया देने के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी बात तेजी से रखने की तैयारी में है। इसके लिए जिला और विधानसभा स्तर पर डिजिटल नेटवर्क को सक्रिय करने और संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। रणनीति यह है कि विपक्ष की ओर से कोई बड़ा मुद्दा उठाए जाने पर बीजेपी का पक्ष भी समय रहते जनता के सामने पहुंचे।
2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद जातीय समीकरण साधना भी बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती है। पार्टी की नजर खास तौर पर कुर्मी, निषाद और मौर्य समुदाय के मतदाताओं पर है। समाजवादी पार्टी की पीडीए राजनीति के मुकाबले बीजेपी गैर-यादव ओबीसी और अन्य पिछड़े समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। इसके लिए इन समुदायों के नेताओं को संगठन में जिम्मेदारी देने और स्थानीय स्तर पर संवाद बढ़ाने की रणनीति पर विचार किया जा रहा है।
गोरखपुर दौरे के दौरान नितिन नबीन की नेताओं से मुलाकातों को भी राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। वह पूर्व सांसद कमलेश पासवान के घर पहुंचे और निषाद पार्टी के अध्यक्ष एवं मंत्री संजय निषाद से उनके आवास पर मुलाकात की। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के आवास पर रात्रिभोज भी हुआ। इन मुलाकातों को पूर्वांचल में संगठनात्मक समन्वय और सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, गोरखपुर की बैठक से संकेत मिलता है कि बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव में विकास और सरकारी योजनाओं के साथ हिंदुत्व, कानून-व्यवस्था, जातीय प्रतिनिधित्व और सोशल मीडिया की रणनीति को भी प्रमुखता दे सकती है। हालांकि, चुनाव में पार्टी का अंतिम एजेंडा और प्रचार की दिशा आने वाले महीनों में संगठन की तैयारियों और राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर और स्पष्ट होगी।



