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ODOP के आंकड़े चमकदार, लेकिन कारीगरों की जेब खाली? जानें UP में पारंपरिक हुनर की असली कमाई

बनारस की रेशमी साड़ियां, मुरादाबाद के पीतल के उत्पाद, भदोही के कालीन, कन्नौज का इत्र, फिरोजाबाद की कांच की चूड़ियां और सहारनपुर की लकड़ी पर नक्काशी। उत्तर प्रदेश की ये पारंपरिक कलाएं देश ही नहीं, दुनिया में अपनी पहचान रखती हैं। इन उत्पादों के पीछे सिर्फ कला और संस्कृति नहीं, बल्कि लाखों कारीगरों और उनके परिवारों की आजीविका भी जुड़ी है। लेकिन बदलते बाजार और मशीनों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच एक बड़ा सवाल है—क्या पारंपरिक हुनर से आज भी एक परिवार का घर आसानी से चल सकता है?

उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) योजना की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य हर जिले के खास उत्पाद को पहचान दिलाना, उसकी ब्रांडिंग करना और उसे राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना है। योजना के जरिए स्थानीय कारीगरों और छोटे उद्यमियों को प्रशिक्षण, टूलकिट, वित्तीय सहायता, पैकेजिंग और मार्केटिंग जैसी सुविधाओं से जोड़ने की कोशिश की गई है। मकसद साफ है—स्थानीय हुनर को रोजगार और कारोबार का मजबूत आधार बनाना।

सरकारी आंकड़े भी इस दिशा में किए गए प्रयासों की तस्वीर पेश करते हैं। उत्तर प्रदेश के MSME 1-Connect पोर्टल के मुताबिक, वित्त वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच ODOP प्रशिक्षण एवं टूलकिट योजना के तहत 1,33,472 लाभार्थियों का प्रशिक्षण पूरा हुआ और 1,28,672 टूलकिट वितरित की गईं। वहीं ODOP मार्जिन मनी योजना के तहत 17,985 लाभार्थियों को वित्तीय सहायता दी गई। पोर्टल पर इस अवधि में 2,74,681 रोजगार सृजित होने का आंकड़ा दर्ज है।

निर्यात के मोर्चे पर भी उत्तर प्रदेश की स्थिति महत्वपूर्ण रही है। 12 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में दिए गए सरकारी जवाब के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में प्रदेश का कुल रिकॉर्डेड निर्यात 1,86,060 करोड़ रुपये रहा। इसमें ODOP उत्पादों की हिस्सेदारी लगभग 45 से 50 प्रतिशत आंकी गई। हालांकि, कई उत्पादों के लिए अलग HSN कोड उपलब्ध नहीं होने के कारण उनका सटीक निर्यात आंकड़ा अलग से बताना संभव नहीं है। ये आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के पारंपरिक उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने के प्रयास हुए हैं।

लेकिन यहां एक अहम सवाल खड़ा होता है—क्या निर्यात और बिक्री बढ़ने का सीधा फायदा कारीगरों की जेब तक पहुंच रहा है? किसी उत्पाद की बाजार में ऊंची कीमत होना और उसे बनाने वाले व्यक्ति की आमदनी बढ़ना दो अलग-अलग बातें हैं। मसलन, हाथ से तैयार कालीन या पीतल के सामान की अंतिम कीमत में कच्चा माल, मजदूरी, डिजाइन, परिवहन, पैकेजिंग, मार्केटिंग और व्यापारी का मुनाफा शामिल होता है। कई बार उत्पाद बनाने वाले कारीगर को अंतिम बिक्री मूल्य का सीमित हिस्सा ही मिल पाता है।

कारीगरों की एक बड़ी चुनौती काम की नियमितता भी है। त्योहारों, शादियों और विशेष मौकों पर उत्पादों की मांग बढ़ जाती है, लेकिन बाकी महीनों में ऑर्डर कम हो सकते हैं। ऐसे में परिवार की मासिक जरूरतें, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और मकान का खर्च संभालना मुश्किल हो जाता है। खासकर उन परिवारों के लिए चुनौती ज्यादा है, जिनकी पूरी आजीविका इसी पारंपरिक काम पर निर्भर है।

मशीनों से बने सस्ते उत्पादों ने भी पारंपरिक कारीगरों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। मशीनों के जरिए कम समय में बड़ी मात्रा में सामान तैयार किया जा सकता है, जबकि हाथ से बनी चीजों में ज्यादा मेहनत और समय लगता है। इसके अलावा ग्राहकों की पसंद भी बदल रही है। अब आकर्षक डिजाइन, आधुनिक पैकेजिंग और ऑनलाइन उपलब्धता खरीदारी के महत्वपूर्ण आधार बन गए हैं। ऐसे में पारंपरिक हुनर को बचाने के साथ उसे नए बाजार की जरूरतों के अनुरूप ढालना भी जरूरी हो गया है।

ODOP के साथ उत्तर प्रदेश में विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना जैसी पहल भी पारंपरिक कारीगरों के कौशल विकास और आजीविका को मजबूत करने के उद्देश्य से चलाई जा रही हैं। हालांकि, किसी भी योजना की असली सफलता केवल प्रशिक्षण देने या टूलकिट बांटने से तय नहीं हो सकती। यह देखना भी जरूरी है कि इससे कारीगरों की मासिक आमदनी में कितना बदलाव आया और उन्हें सालभर कितना नियमित काम मिल रहा है।

कारीगरों की कमाई बढ़ाने के लिए उन्हें सीधे खरीदारों से जोड़ना, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर उनकी भागीदारी बढ़ाना और बिचौलियों पर निर्भरता कम करना अहम हो सकता है। इसके साथ ही कच्चे माल की उपलब्धता, उचित मजदूरी, डिजाइन प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अगर कारीगर को उसके हुनर का सही मूल्य मिले और उत्पादों की मांग लगातार बनी रहे, तभी पारंपरिक कला एक मजबूत आजीविका का आधार बन सकेगी।

उत्तर प्रदेश की ODOP योजना ने स्थानीय उत्पादों को नई पहचान दिलाने और उन्हें बड़े बाजार तक पहुंचाने की दिशा में काम किया है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी परीक्षा अब भी बाकी है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रदेश से कितना निर्यात हुआ या कितने लोगों को प्रशिक्षण मिला, बल्कि यह है कि इन प्रयासों से कारीगरों के घर की आर्थिक स्थिति कितनी बदली। आखिरकार किसी पारंपरिक कला की असली सफलता उसके उत्पाद की कीमत या निर्यात के आंकड़ों से नहीं, बल्कि उस परिवार की खुशहाली से मापी जानी चाहिए जिसके हाथों से वह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिंदा है।

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