‘वर्दी’: शहादत का गौरव, कर्तव्य की अमरता और बिछोह की पीड़ा बयां करती यूपी पुलिस की फिल्म
वर्दी पहनकर घर से निकलने वाला हर पुलिसकर्मी लौटने का वादा तो करता है, लेकिन लौट आने का भरोसा नहीं दे सकता। उसकी प्रतीक्षा में भी किसी मां की आंखें दरवाजे पर लगी रहती होंगी, कोई पत्नी घड़ी देखती होगी और कोई बच्चा पिता के कदमों की आहट पहचानता होगा।
लेकिन जिस वर्दी को पहनकर वह घर से निकलता है, वह कभी-कभी उसे ऐसे कर्तव्यपथ पर ले जाती है, जहां लौटने की इच्छा से बड़ा देश और समाज की सुरक्षा का संकल्प हो जाता है।
वर्दी के पीछे धड़कते इसी मानवीय संसार को उत्तर प्रदेश पुलिस की लघु फिल्म ‘वर्दी’ ने अपनी कथा का आधार बनाया है। पुलिस स्मृति दिवस, 21 अक्टूबर 2026 के अवसर पर जारी यह फिल्म शहादत को केवल वीरता की घटना के रूप में नहीं देखती, बल्कि उस घर की खामोशी को भी महसूस कराती है, जहां किसी अपने के चले जाने के बाद जीवन पहले जैसा नहीं रह जाता।
जनवरी 2025 की वह सर्द रात थी। 20 और 21 जनवरी की मध्यरात्रि को शामली में मुकीम काला गैंग के बदमाशों से पुलिस की मुठभेड़ हुई। गोलियां चलीं और निरीक्षक सुनील कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए। लेकिन घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी टीम का नेतृत्व नहीं छोड़ा। उनके नेतृत्व में पुलिस की आत्मरक्षार्थ जवाबी कार्रवाई में एक लाख रुपये के इनामी बदमाश अरशद सहित चार बदमाश मारे गए। दो दिन बाद, 22 जनवरी को सुनील कुमार वीरगति को प्राप्त हुए।
उस रात एक पुलिस अधिकारी ने कर्तव्य की सर्वोच्च मिसाल प्रस्तुत की, लेकिन उसी घटना ने एक परिवार से उसका अपना छीन लिया। पुलिस बल के लिए वह अदम्य साहस की गाथा थी, तो परिवार के लिए जीवनभर साथ रहने वाली स्मृति। इसी एक घटना के दो पक्षों शहादत के गौरव और बिछोह की वेदना को ‘वर्दी’ संवेदनशीलता से सामने लाती है।
किसी शहीद के परिवार से पूछिए, तो वह अपने प्रियजन के बलिदान पर गर्व करेगा। लेकिन उसी गर्व के पीछे कितनी अधूरी बातें, कितनी प्रतीक्षाएं और कितने अनकहे आंसू छिपे होते हैं, इसे शब्दों में समेटना आसान नहीं।
त्योहार फिर आते हैं, घर में उत्सव भी मनते हैं, बच्चे बड़े भी होते हैं, मगर हर खुशी में एक अनुपस्थित चेहरा याद आता है। ‘वर्दी’ इसी मौन पीड़ा को दर्शक के हृदय तक पहुंचाने का प्रयास करती है।
ऐसी कहानी को पर्दे पर उतारने के लिए संवेदनशील दृष्टि की आवश्यकता थी। प्रख्यात फिल्म निर्देशक, लेखक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया ने इस दायित्व को संभाला।
‘हासिल’, ‘साहेब बीवी और गैंगस्टर’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘बुलेट राजा’ और ‘राग देश’ जैसी फिल्मों के माध्यम से मानवीय संघर्षों को स्वर देने वाले धूलिया की ‘पान सिंह तोमर’ को 60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मिला था।
इसी फिल्म की पटकथा के लिए उन्हें संजय चौहान के साथ फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। ‘वर्दी’ में उनकी निर्देशन-दृष्टि शौर्य के साथ संवेदना को स्थान देने के प्रयास से जुड़ती है।
इस भावनात्मक कथा को अभिनेता अमित साध, वरिष्ठ अभिनेत्री अलका अमीन और नाज़िश ख़ान ने अपने अभिनय से आकार दिया है। ‘काई पो छे!’, ‘सुल्तान’, ‘गोल्ड’, ‘सरकार 3’ और ‘शकुंतला देवी’ जैसी फिल्मों तथा ‘ब्रीद’ और ‘ब्रीद: इन्टू द शैडोज़’ जैसी वेब सीरीज से पहचान बनाने वाले अमित साध के साथ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पूर्व छात्रा अलका अमीन का जुड़ना उल्लेखनीय है। ‘दम लगा के हईशा’ और ‘बधाई हो’ जैसी फिल्मों में अलका अमीन का संजीदा अभिनय दर्शकों के मन में अपनी छाप छोड़ चुका है।