‘दुनिया अतिवाद से परेशान, भारत दिखाएगा शांति का रास्ता’, मोहन भागवत का बड़ा बयान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि दुनिया आज कई तरह के विरोधाभास और अतिवाद से जूझ रही है। ऐसे समय में संतुलन और शांति का रास्ता भारत की ज्ञान परंपरा से निकल सकता है। उन्होंने यह बात मुंबई में आयोजित अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही।
मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया में विकास और पर्यावरण संरक्षण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन तथा धार्मिक आस्था और संघर्ष जैसे कई मुद्दों के बीच संतुलन की चुनौती बनी हुई है। उनके मुताबिक, किसी एक पक्ष को पूरी तरह चुन लेने से इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि इसी असंतुलन और अतिवाद के कारण दुनिया परेशान है।
भागवत ने कहा कि दुनिया भारत की ओर उम्मीद से देख रही है। उन्होंने भारत की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब 3,000 वर्षों तक भारत ने दूसरे देशों पर विजय हासिल किए बिना और लोगों का धर्म परिवर्तन कराए बिना ज्ञान और शांति का मार्ग साझा किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भी भारत दुनिया को संतुलन और शांति का रास्ता दिखा सकता है।
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा का भी जिक्र किया। उन्होंने वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, जैन आगम, त्रिपिटक, गुरु ग्रंथ साहिब और संतों की शिक्षाओं को भारत की ज्ञान-संपदा का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि इस ज्ञान की आज दुनिया को जरूरत है।
उन्होंने आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने वाले लोगों के जीवन और उनके योगदान को संरक्षित करने पर भी जोर दिया। भागवत के मुताबिक, इन परंपराओं की रक्षा को केवल धार्मिक जिम्मेदारी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह मानवता की सेवा से भी जुड़ा विषय है।
मोहन भागवत ने समर्पण के महत्व पर भी बात की। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का समर्पण किसी नेक, सुंदर और पवित्र उद्देश्य के लिए हो तो वह उसके जीवन को सार्थक बना सकता है। उन्होंने सम्मेलन में शामिल लोगों से अपनी परंपराओं और उद्देश्यों के प्रति समर्पण के साथ काम करने का आह्वान किया।
अपने संबोधन में भागवत ने भारत में धर्म और राष्ट्र के संबंध पर भी बात की। उन्होंने कहा कि भारतीय संदर्भ में दोनों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता और भारत की ज्ञान तथा आध्यात्मिक परंपराएं मौजूदा वैश्विक चुनौतियों पर विचार करने में योगदान दे सकती हैं।