शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, शिंदे गुट बोला- अयोग्यता याचिका के चलते EC को नहीं रोक सकते
शिवसेना के चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एनके कौल ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को शिवसेना के चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर फैसला करना जरूरी था और केवल अयोग्यता याचिकाओं के लंबित होने के आधार पर चुनाव आयोग को कार्रवाई से नहीं रोका जा सकता।
एनके कौल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि 2011 के बाद शिवसेना का कोई नया संविधान चुनाव आयोग के पास जमा कराया गया था। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने अपने दो आदेशों में स्पष्ट किया था कि उसके पास पार्टी का जो संविधान उपलब्ध था, वह 2011 का संविधान था और इसे चुनाव आयोग की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किया गया था।
शिंदे गुट के वकील ने कहा कि बाद में पार्टी के संविधान में बदलाव किए जाने और उसे चुनाव आयोग को सौंपे जाने का दावा किया गया, लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को भेजे गए पत्रों में पार्टी के चुनावों का उल्लेख तो मिलता है, लेकिन नए संविधान को आयोग के समक्ष जमा किए जाने का प्रमाण नहीं मिलता।
सुनवाई के दौरान एनके कौल ने राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के महत्व का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने अर्जुन सिंह बनाम अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मामले का हवाला देते हुए कहा कि राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद होते हैं और उन्हें अपने भीतर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। उनके मुताबिक, अगर किसी पार्टी में समय-समय पर संगठनात्मक चुनाव नहीं होते हैं और आंतरिक लोकतंत्र कायम नहीं रहता, तो राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र को बढ़ावा देने के उसके दावे पर सवाल उठ सकते हैं।
अयोग्यता याचिकाओं को लेकर भी शिंदे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी स्थिति स्पष्ट की। एनके कौल ने कहा कि किसी विधायक के खिलाफ अयोग्यता की याचिका दाखिल होना और उस पर अंतिम फैसला आना दो अलग-अलग बातें हैं। उन्होंने दलील दी कि जब तक अयोग्यता पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक संबंधित व्यक्ति अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने का हकदार है।
शिंदे गुट के वकील ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए गए सवालों का भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मामले में ऐसी दलीलें दी गई हैं, जिनसे चुनाव आयोग की मंशा पर संदेह पैदा करने की कोशिश की गई है। उनके मुताबिक, आयोग ने पार्टी के संविधान की जांच को लेकर जो प्रक्रिया अपनाई, उस पर भी सवाल उठाए गए, जबकि आयोग इस मुद्दे पर पहले से विचार करता रहा था।
चुनाव चिह्न के विवाद पर फैसला लेने में कथित जल्दबाजी के आरोप को भी एनके कौल ने खारिज किया। उन्होंने कहा कि यह तर्क दिया जा रहा है कि चुनाव आयोग को अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला होने तक चुनाव चिह्न के मामले में आगे नहीं बढ़ना चाहिए था। हालांकि, उनके मुताबिक ऐसा कोई संवैधानिक क्रम निर्धारित नहीं है कि पहले अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला हो और उसके बाद ही चुनाव आयोग चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर निर्णय ले।
उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के स्तर पर अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला आने में लंबा समय लग सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग को चुनाव चिह्न के विवाद पर निर्णय लेने से रोका नहीं जा सकता, क्योंकि चुनाव चिह्न से जुड़ा मुद्दा ऐसा है जिस पर समय रहते फैसला होना आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान विवाद से जुड़े फैसले के प्रभाव को लेकर भी दलील दी गई। एनके कौल ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले को पिछली तारीख से लागू होने वाला यानी रेट्रोस्पेक्टिव बताने की कोशिश सही नहीं है। उन्होंने राणा मामले में की गई टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा कि उसे उसके संदर्भ से अलग करके मौजूदा मामले पर लागू नहीं किया जा सकता।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने दलील दी कि संबंधित व्यवस्था भविष्य के लिए लागू होती है और जिस दिन घटना होती है, उसी समय से उसके प्रभाव को देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, यह मुद्दा अब ऐसा नहीं है जिस पर कोई कानूनी स्थिति पहले से तय न हो। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को अयोग्यता याचिकाओं के अंतिम फैसले तक इंतजार करने के लिए बाध्य करना संविधान पीठ और पहले के न्यायिक फैसलों की भावना के अनुरूप नहीं होगा।
शिवसेना के चुनाव चिह्न विवाद में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें चुनाव आयोग की भूमिका, पार्टी के संविधान, आंतरिक लोकतंत्र और विधायकों की अयोग्यता जैसे कई संवैधानिक और कानूनी मुद्दे जुड़े हुए हैं। बुधवार की सुनवाई में शिंदे गुट ने मुख्य रूप से यह तर्क रखा कि चुनाव आयोग को अपने अधिकार क्षेत्र के तहत चुनाव चिह्न विवाद पर निर्णय लेने से केवल अयोग्यता याचिकाओं के लंबित होने के आधार पर नहीं रोका जा सकता।