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दो से ज्यादा बच्चे हैं तो चुनाव नहीं लड़ पाएंगे? सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों की प्रासंगिकता पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनावों में दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया है। अदालत ने कहा कि भारत में घटती प्रजनन दर और बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे कानूनों पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़े जनसंख्या नियंत्रण के नियमों पर नई बहस शुरू हो सकती है।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कहा कि दो से अधिक बच्चे होने के आधार पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले प्रावधानों के पीछे दिए जाने वाले तर्कों की मौजूदा परिस्थितियों में समीक्षा जरूरी है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2003 के ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है। इस मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं लड़ सकता था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत में प्रजनन दर में आई गिरावट को ध्यान में रखते हुए ऐसे प्रतिबंधों की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर फिर से विचार किया जाना चाहिए। अदालत की टिप्पणी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि देश के अलग-अलग राज्यों में स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों से संबंधित नियम लागू रहे हैं। हालांकि, इन नियमों की संवैधानिक वैधता और भविष्य को लेकर अंतिम स्थिति बड़ी पीठ के विचार के बाद ही स्पष्ट होगी।

इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता भी रद्द कर दी। उन्हें तीसरे बच्चे के जन्म के आधार पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। इस कानून में 13 सितंबर 2000 से लागू संशोधन के तहत दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक का प्रावधान किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी और मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने के फैसले से स्थानीय निकाय चुनावों में लागू दो-बच्चे की पात्रता शर्त पर कानूनी बहस आगे बढ़ेगी। फिलहाल अदालत ने इन कानूनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया है, लेकिन इससे सभी राज्यों में ऐसे प्रावधान अपने आप समाप्त नहीं हो जाते। आगे की कानूनी स्थिति बड़ी पीठ के फैसले पर निर्भर करेगी।

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