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रंजना देसाई कौन हैं ? उत्तराखंड के बाद अब गुजरात के लिए UCC का मसौदा तैयार करेंगी

रंजना देसाई कौन हैं ? उत्तराखंड के बाद अब गुजरात के लिए UCC का मसौदा तैयार करेंगी

उत्तराखंड के बाद, गुजरात सरकार ने भी नागरिक संहिता (UCC) का ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी रिटायर जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को सौंप दी है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस मसौदे के लिए एक समिति का गठन किया है, जिसमें रंजना देसाई के अलावा चार अन्य सदस्य भी शामिल हैं। यह समिति 45 दिनों में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।

गुजरात, उत्तराखंड के बाद दूसरा राज्य है, जिसने नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने का निर्णय लिया है। दिलचस्प बात यह है कि रंजना देसाई, जिन्होंने उत्तराखंड में भी नागरिक संहिता पर रिपोर्ट तैयार की थी, गुजरात सरकार ने उन्हीं पर विश्वास जताया है।

रिटायर जज रंजना प्रकाश देसाई का परिचय: रंजना देसाई का जन्म 1949 में मुंबई में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से की और बाद में वकालत की पढ़ाई सरकारी कॉलेज से की। रंजना खुद अपने लेख में बताती हैं कि वकालत में आने के उनके निर्णय का उनके पिता एसजी सामंत ने विरोध किया था, जो उस समय के प्रसिद्ध वकील थे। वे चाहते थे कि रंजना लंदन जाकर इकॉनोमिक्स की पढ़ाई करें।

1996 में रंजना देसाई को मुंबई हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया गया, और 15 साल तक वहां काम करने के बाद 2011 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में मात्र तीन साल तक कार्य किया।

रिटायर होने के बाद रंजना देसाई ने कई महत्वपूर्ण आयोगों और समितियों की अध्यक्षता की, जिनमें परिसीमन आयोग और नागरिक संहिता आयोग शामिल हैं। उनकी शादी प्रकाश देसाई से हुई है।

कानूनी करियर की शुरुआत और संघर्ष: रंजना देसाई अपने लेख में बताती हैं कि उनके पिता के विरोध के बावजूद, उन्होंने अपने रिश्तेदार के चैंबर में काम करना शुरू किया। यहां एक मुवक्किल से उन्हें केस मिला, जिसमें वह जमानत के लिए परेशान था। इस केस के लिए रंजना को मात्र 35 रुपए फीस मिली। हालांकि, यह केस पहले निचली अदालत से खारिज हो गया, लेकिन रंजना ने हार मानते हुए इसे हाई कोर्ट में पेश किया, जहां उनकी दलील के बाद आरोपी को जमानत मिल गई। यह उनके करियर की पहली महत्वपूर्ण जीत थी।

सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण फैसले: सुप्रीम कोर्ट में जज रहते हुए रंजना देसाई ने कई ऐतिहासिक फैसले दिए। इनमें से कालाधन और नित्यानंद के पौरुष टेस्ट पर दिए गए उनके फैसले प्रमुख हैं। नित्यानंद ने कालाधन पर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। इसके अलावा, रंजना ने एक अहम फैसले में कहा था कि गुंडा एक्ट के तहत किसी भी व्यक्ति को 12 महीने से ज्यादा जेल में नहीं रखा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि न्यायालय को किसी भी समय किसी भी गवाह को बुलाने का अधिकार है।

रंजना देसाई उस बेंच का हिस्सा थीं, जिसने मुंबई हमले के दोषी अजमल आमिर कसाब को फांसी देने का निर्णय लिया। इसके अलावा, वे सहारा वर्सेज सेबी मामले की ऐतिहासिक सुनवाई में भी जज रह चुकी हैं।

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