मुख्य सामग्री पर जाएं
ब्रेकिंग न्यूज़
‘पैसे मांगे तो जेल में सड़ना पड़ेगा’, शिक्षकों को नियुक्ति पत्र देते समय CM योगी की सख्त चेतावनी क्या दूसरे राज्यों में भी दिख रहा योगी मॉडल? बिहार के जमुई कांड से कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल योगी सरकार का जॉब कैलेंडर ऑन! 4 दिन में 5,297 युवाओं को मिली सरकारी नौकरी CM योगी देंगे 818 युवाओं को नियुक्ति पत्र, स्वास्थ्य से आयुष तक इन पदों पर मिलेगी नौकरी अमित शाह करेंगे यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो का उद्घाटन, 25 सितंबर से शुरू होगा बड़ा आयोजन ‘बंदूक की राजनीति अब नहीं चलेगी’, मेरठ में सीएम योगी का सपा-कांग्रेस पर बड़ा हमला मेरठ में नितिन नवीन का सपा-कांग्रेस पर हमला, बोले- यूपी को फिर बांटने की कोशिश हो रही ‘2027 में सपा को अपनी हार साफ दिख रही’, दानिश आजाद अंसारी का अखिलेश यादव पर तीखा हमला यूपी में 2027 से पहले पोस्टर वार तेज, अखिलेश यादव के खिलाफ लगे ‘आजम-अतीक-मुख्तार’ वाले पोस्टर 2027 से पहले बड़ा सवाल: उत्तर प्रदेश के लिए योगी मॉडल कितना जरूरी? कानून-व्यवस्था, रोजगार, महिला सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिपोर्ट

चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में बड़ा बयान ‘देशभर में होगा वोटर लिस्ट का रिवीजन

चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में बड़ा बयान ‘देशभर में होगा वोटर लिस्ट का रिवीजन

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार, 10 जुलाई 2025 को बिहार में चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को जल्दबाजी और मनमाना करार दिया, जबकि चुनाव आयोग ने इसे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी बताकर इसका बचाव किया।याचिकाकर्ताओं का आरोप: वोटर लिस्ट संशोधन में मनमानी
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने दलील दी कि वोटर लिस्ट संशोधन का प्रावधान कानून में है, जो या तो सीमित (summary) हो सकता है या व्यापक (intensive)। लेकिन, इस बार चुनाव आयोग ने ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ जैसा नया शब्द गढ़ लिया है। उन्होंने कहा कि 2003 में भी ऐसी प्रक्रिया हुई थी, लेकिन तब वोटरों की संख्या कम थी। अब बिहार में 7 करोड़ से अधिक मतदाता हैं, और इतनी तेजी से प्रक्रिया चलाने से कई लोगों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है।

उन्होंने बताया कि आयोग 11 दस्तावेजों को स्वीकार कर रहा है, लेकिन आधार कार्ड और वोटर आईडी जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों को मान्यता नहीं दी जा रही। आयोग का कहना है कि 2003 की सूची में शामिल लोगों को अपने माता-पिता के दस्तावेज देने की जरूरत नहीं, लेकिन जो उस सूची में नहीं हैं, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करनी होगी।कोर्ट की टिप्पणी: प्रक्रिया संवैधानिक, लेकिन पारदर्शी होनी चाहिए
जस्टिस सुधांशु धुलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि वोटर लिस्ट की जांच करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। आयोग को यह सुनिश्चित करना है कि कोई अयोग्य व्यक्ति मतदाता न बन सके। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है, और मतदाता बनने के लिए नागरिकता साबित करना जरूरी हो सकता है।

जस्टिस धुलिया ने सवाल उठाया, “अगर 2003 की लिस्ट मौजूद है, तो क्या घर-घर जाकर सत्यापन जरूरी है? जो लोग पहले से वोट डाल रहे हैं, उनसे बार-बार नागरिकता का सबूत क्यों मांगा जा रहा है?”कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी की दलील: आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि वोटर लिस्ट से सिर्फ तीन तरह के लोग बाहर हो सकते हैं—गैर-नागरिक, मानसिक रूप से अक्षम, और सजायाफ्ता अपराधी। उन्होंने सवाल किया कि चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार कैसे है? सिब्बल ने कहा कि अगर किसी का नाम हटाया जा रहा है, तो उसे पहले सूचना दी जानी चाहिए और कारण बताया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में सिर्फ 2% लोगों के पास पासपोर्ट है, और बर्थ सर्टिफिकेट या मनरेगा कार्ड जैसे दस्तावेजों को भी आयोग स्वीकार नहीं कर रहा, जिससे गरीब और वंचित वर्ग प्रभावित हो रहा है।

अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि 2003 में ऐसी प्रक्रिया तब हुई थी, जब चुनाव दूर थे। लेकिन अब बिहार में चुनाव नजदीक हैं, और जून में SIR का आदेश देना लोगों को तैयारी का मौका नहीं देता। उन्होंने आशंका जताई कि पश्चिम बंगाल में भी ऐसी ही प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

Share
अगला लेख → ब्राजील के बाद अब भारत पर 500% का टैरिफ लगा सकता है US, ट्रं…

टिप्पणी करें

Your email address will not be published. Required fields are marked *