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‘स्टील फ्रेम’ पर पुनर्विचार की जरूरत: मंत्री असीम अरुण ने नौकरशाही मॉडल पर उठाए सवाल

उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने नौकरशाही की मौजूदा कार्यप्रणाली और यूपीएससी भर्ती व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए प्रशासनिक सुधारों की वकालत की है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की जरूरतों के अनुरूप विशेषज्ञता आधारित, जवाबदेह और लचीली प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने का समय आ गया है।

‘स्टील फ्रेम’ पर पुनर्विचार की जरूरत: मंत्री असीम अरुण ने नौकरशाही मॉडल पर उठाए सवाल

लखनऊ, 19 जुलाई। उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने देश की नौकरशाही की वर्तमान कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि प्रशासन के पारंपरिक “स्टील फ्रेम” मॉडल पर पुनर्विचार किया जाए और विकसित भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप अधिक लचीली, विशेषज्ञता आधारित और जवाबदेह व्यवस्था विकसित की जाए।

रविवार को सोशल मीडिया पर साझा की गई अपनी विस्तृत पोस्ट में असीम अरुण ने लिखा कि जब तक सरकारी नीतियां केवल फाइलों और कागजों तक सीमित रहेंगी और उनका व्यावहारिक क्रियान्वयन नहीं होगा, तब तक लोक कल्याण का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा। उन्होंने कहा कि नीति निर्माण में व्यावहारिकता का अभाव प्रशासनिक मशीनरी की सबसे बड़ी कमजोरी है।

उन्होंने कहा कि प्रशासन की सफलता कुछ चुनिंदा अधिकारियों पर नहीं, बल्कि मजबूत संस्थागत व्यवस्था पर निर्भर करती है। चुनाव प्रबंधन और आपदा प्रबंधन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में सफलता किसी एक अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम और लाखों कर्मचारियों के सामूहिक प्रयास का परिणाम होती है।

यूपीएससी भर्ती प्रणाली पर भी उठाए सवाल

असीम अरुण ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की भर्ती प्रणाली में भी बदलाव की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में कई अधिकारी ऐसे क्षेत्रों में नियुक्त हो जाते हैं, जिनमें उनकी न तो शैक्षणिक विशेषज्ञता होती है और न ही रुचि। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि विदेश सेवा में चयनित अभ्यर्थियों ने कई बार न तो अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन किया होता है और न ही विदेशी भाषाओं का पर्याप्त ज्ञान होता है।

उन्होंने सुझाव दिया कि विदेश सेवा, राजस्व, पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य विशेषज्ञ सेवाओं के लिए अलग-अलग भर्ती परीक्षाएं आयोजित की जानी चाहिए, ताकि संबंधित क्षेत्रों में दक्ष और प्रशिक्षित अधिकारी मिल सकें।

विशेषज्ञता आधारित नियुक्तियों की पैरवी

मंत्री ने कहा कि हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र के विशेषज्ञों को व्यवस्था अधिकारी, मीडिया पृष्ठभूमि वाले युवाओं को सूचना अधिकारी और माइनिंग विशेषज्ञों को खनन विभाग में नियुक्त करने जैसे प्रयोगों के सकारात्मक परिणाम मिले हैं। इसी प्रकार डॉक्टरों को स्वास्थ्य विभाग, वन सेवा अधिकारियों को वन विभाग, शिक्षकों को शिक्षा विभाग और वित्त विशेषज्ञों को वित्त विभाग में अधिक अवसर दिए जाने चाहिए।

पोस्टिंग और लैटरल एंट्री पर भी सुझाव

असीम अरुण ने अधिकारियों की पोस्टिंग प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अक्सर नियुक्तियों में योग्यता और रुचि का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जाता। उन्होंने भारतीय राजस्व सेवा (IRS) और शिक्षा विभाग की “चॉइस-कम-मेरिट” प्रणाली का उदाहरण देते हुए इसे अन्य विभागों में भी लागू करने की वकालत की।

उन्होंने लैटरल एंट्री और लैटरल एग्जिट व्यवस्था को समय की मांग बताते हुए कहा कि विशेषज्ञ पेशेवरों को निश्चित अवधि के लिए प्रशासन में शामिल किया जाए और उनके प्रदर्शन के आधार पर आगे का निर्णय लिया जाए। इससे प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और कार्यकुशलता बढ़ेगी।

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