UP चुनाव से पहले CM योगी का मेगा कैंपेन, 2 महीने में 100 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचे
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही प्रदेश की राजनीति में गतिविधियां तेज हो गई हैं। चुनावी माहौल के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार प्रदेशभर में दौरे, जनसभाएं और विकास कार्यक्रमों के जरिए जनता के बीच सक्रिय नजर आ रहे हैं। पिछले दो महीनों के दौरान उन्होंने राज्य के सभी 18 मंडलों का दौरा करते हुए 100 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बनाई है। इन दौरों के दौरान उन्होंने विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया, कानून-व्यवस्था की समीक्षा की तथा विभिन्न जनसभाओं के माध्यम से लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सक्रियता केवल चुनावी सभाओं तक सीमित नहीं है। वे सरकारी बैठकों, संगठनात्मक कार्यक्रमों, प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात, प्रशासनिक समीक्षा और नियमित जनता दर्शन के माध्यम से भी लगातार लोगों की समस्याएं सुन रहे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड तक उनके लगातार दौरे यह संकेत देते हैं कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव से पहले संगठन और सरकार, दोनों स्तरों पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने में जुटी है।
वहीं, विपक्षी दलों की सक्रियता की तुलना करें तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी आखिरी बड़ी सार्वजनिक रैली मार्च में गाजियाबाद के दादरी क्षेत्र में की थी, जिसे पार्टी के चुनावी अभियान की शुरुआत माना गया था। इसके बाद से वे मुख्य रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया और पार्टी नेताओं के निजी कार्यक्रमों तक ही सीमित दिखाई दिए हैं। पिछले कई महीनों में उनकी ओर से कोई बड़ी जनसभा आयोजित नहीं की गई है।
दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती भी लंबे समय से बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर हैं। उत्तर प्रदेश में उनकी आखिरी बड़ी रैली 9 अक्टूबर 2025 को लखनऊ स्थित कांशीराम स्मारक स्थल पर हुई थी। इसके बाद पार्टी की गतिविधियां मुख्य रूप से सोशल मीडिया और संगठनात्मक स्तर तक ही सीमित रही हैं। चुनाव नजदीक होने के बावजूद बीएसपी की जमीनी सक्रियता भाजपा और समाजवादी पार्टी की तुलना में कम दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान समय में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार जनसभाओं, विकास परियोजनाओं और जनता से सीधे संवाद के जरिए चुनावी माहौल में बढ़त बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दलों की रणनीति फिलहाल सीमित सार्वजनिक गतिविधियों पर केंद्रित नजर आ रही है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अखिलेश यादव और मायावती अपनी चुनावी रणनीति को किस तरह तेज करते हैं और जनता के बीच अपनी मौजूदगी को किस रूप में मजबूत बनाते हैं।