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जेल से बाहर आते ही ED ने किया गिरफ्तार, आजम खान की मुश्किलें फिर बढ़ीं; 92 FIR और 9 मामलों में हो चुका है दोषी करार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी समाजवादी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने वाले आजम खान एक बार फिर कानूनी मुश्किलों में घिर गए हैं। करीब 11 महीने तक रामपुर जेल में रहने के बाद 31 अक्टूबर 2026 को उन्हें और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को दो पैन कार्ड से जुड़े मामले में जमानत मिलने पर जेल से रिहाई मिली। लेकिन आजम खान के लिए यह राहत ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। जेल से बाहर निकलने के कुछ ही मिनट बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने उन्हें जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद 1 नवंबर को गाजियाबाद की विशेष अदालत ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर आजम खान के कानूनी मामलों और उनकी राजनीतिक स्थिति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

आजम खान कभी समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी नेताओं में शामिल रहे हैं। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ भी उनका राजनीतिक रिश्ता काफी पुराना रहा है। रामपुर की राजनीति में लंबे समय तक उनका प्रभाव रहा और वह उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री के साथ-साथ सांसद और विधायक भी रह चुके हैं। हालांकि, वर्ष 2019 के बाद उनके खिलाफ दर्ज मुकदमों और लगातार चल रही कानूनी कार्रवाइयों ने उनके राजनीतिक सफर को काफी प्रभावित किया है।

अदालती रिकॉर्ड और हालिया मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आजम खान के खिलाफ कुल 92 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से नौ मामलों में उन्हें दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि 81 मामले अलग-अलग अदालतों में लंबित बताए गए हैं। इन मामलों में जमीन पर कथित कब्जे, जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवाद, सरकारी संपत्तियों के कथित दुरुपयोग, भड़काऊ भाषण और चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन जैसे आरोप शामिल हैं। हालांकि, इन सभी मामलों में आरोप और दोषसिद्धि की कानूनी स्थिति अलग-अलग है।

आजम खान और उनके परिवार से जुड़े मामलों में उनके बेटे अब्दुल्ला आजम का नाम भी कई बार सामने आया है। उनके खिलाफ फर्जी जन्म प्रमाण पत्र, दो पासपोर्ट और दो पैन कार्ड से जुड़े मामले दर्ज हुए। फर्जी जन्म प्रमाण पत्र के मामले में आजम खान, उनकी पत्नी तंजीम फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आजम को भी दोषी ठहराया जा चुका है। वहीं दो पैन कार्ड से जुड़े मामले में आजम खान और अब्दुल्ला को नवंबर 2025 में सजा सुनाई गई थी। इसी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर 2026 को दोनों की सजा पर अंतरिम रोक लगाने के बजाय केवल सजा निलंबित कर जमानत दी। यानी उन्हें जेल से रिहाई तो मिली, लेकिन उनकी दोषसिद्धि बरकरार रही।

जेल से रिहाई के तुरंत बाद हुई गिरफ्तारी का संबंध मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़ी जांच से है। यह यूनिवर्सिटी रामपुर में आजम खान द्वारा स्थापित की गई थी। ईडी इस मामले में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग, जमीन के लेनदेन और वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही है। जांच एजेंसी का आरोप है कि सरकारी कार्यों के लिए आवंटित धन का इस्तेमाल यूनिवर्सिटी के निर्माण में किया गया। ईडी ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के तहत कार्रवाई की है। एजेंसी ने 28 अक्टूबर को यूनिवर्सिटी की जमीन और इमारतों को भी कुर्क किया था। इन संपत्तियों का मौजूदा बाजार मूल्य करीब 1,170 करोड़ रुपये बताया गया है। हालांकि, ये जांच एजेंसी के आरोप हैं, जिनका अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

31 अक्टूबर को जब आजम खान जेल से बाहर आए तो उनके समर्थक बड़ी संख्या में वहां मौजूद थे। लेकिन कुछ ही देर बाद ईडी की टीम ने उन्हें हिरासत में लेकर मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उन्हें पूछताछ के लिए दिल्ली स्थित ईडी कार्यालय ले जाया गया। 1 नवंबर को गाजियाबाद की विशेष PMLA अदालत में पेश किए जाने के बाद उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। अदालत के आदेश के बाद उन्हें गाजियाबाद की डासना जेल में रखा गया है। इस तरह जिस दिन आजम खान को करीब 11 महीने बाद जेल से बाहर आने की राहत मिली थी, उसी दिन उन्हें एक नए मामले में फिर से हिरासत का सामना करना पड़ा।

इस पूरे घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आजम खान के खिलाफ हो रही कार्रवाई को राजनीतिक साजिश बताते हुए सरकार पर निशाना साधा। अखिलेश यादव ने कहा कि एक बुजुर्ग नेता को झूठे मुकदमों में फंसाकर बार-बार जेल भेजना अन्यायपूर्ण है। दूसरी तरफ, ईडी की कार्रवाई जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच के आधार पर की गई है। आजम खान भी पहले कई मौकों पर अपने खिलाफ दर्ज मामलों को राजनीतिक साजिश बताते रहे हैं।

आजम खान का मामला उत्तर प्रदेश की राजनीति में कानून, सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव की एक बड़ी बहस बन गया है। एक तरफ जांच एजेंसियों की कार्रवाई और अदालतों के फैसले हैं, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी इसे राजनीतिक प्रतिशोध का मामला बताती रही है। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मुकदमों को उसकी दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता और प्रत्येक मामले में न्यायिक प्रक्रिया का पालन जरूरी है। इसी तरह किसी जांच एजेंसी के आरोपों को भी अदालत में साबित होना बाकी होता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच में आगे क्या सामने आता है और आजम खान को इस मामले में अदालत से क्या राहत मिलती है? क्या उनकी कानूनी मुश्किलें आने वाले दिनों में और बढ़ेंगी या उन्हें राहत मिलेगी? फिलहाल इतना साफ है कि आजम खान के लिए राजनीतिक वापसी का रास्ता आसान नहीं है और उनकी कानूनी लड़ाई का असर समाजवादी पार्टी की राजनीति पर भी पड़ सकता है।

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