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डिग्री से पहले दबाव, सपनों से पहले सिस्टम! ट्यूशन का ये कैसा जाल?

डिग्री से पहले दबाव, सपनों से पहले सिस्टम! ट्यूशन का ये कैसा जाल?

कभी किसी गांव की पाठशाला में एक मास्टरजी बच्चों को पेड़ की छांव में पढ़ाते थे—बिना फीस के, सिर्फ ज्ञान के लिए। अब वही भारत, जो कभी “गुरुकुल परंपरा” का प्रतीक था, आज ‘कोचिंग इंडस्ट्री’ का सबसे बड़ा बाजार बनता जा रहा है। सवाल उठता है – क्या हमने शिक्षा का मतलब ही बदल दिया है? राजस्थान का कोटा, जहां कभी बच्चों की आंखों में डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना होता था, अब उन आंखों में चिंता, थकावट और कभी-कभी आंसू भी दिखते हैं। हजारों बच्चे घर-परिवार छोड़ कर सिर्फ एक सीट के लिए दिन-रात मशीनों की तरह पढ़ते हैं। क्या ये वही शिक्षा है जिसे हम “राष्ट्र निर्माण” का माध्यम मानते थे? कभी कक्षा में सवाल पूछने का साहस ज्ञान का संकेत माना जाता था। आज, कोचिंग क्लास में सवाल पूछने से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है—टेस्ट सीरीज में टॉप स्कोर करना।
हर साल लाखों बच्चे जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं में बैठते हैं, पर चुनिंदा ही सफल होते हैं। बाक़ी बच्चों के सपने क्या सिर्फ आंकड़ों में दर्ज हो जाने के लिए होते हैं? कोचिंग सेंटर में दाखिला लेने वाले एक 15 साल के छात्र ने कहा,
“मैं पढ़ तो रहा हूं, पर ये समझ नहीं आता कि क्या मैं खुद के लिए जी रहा हूं या सिर्फ एक रैंक के लिए?” शिक्षा अब एक सेवा नहीं, एक व्यापार बन गई है। सपनों का बोझ इतना भारी है कि कभी-कभी यह बच्चों की सांसें छीन लेता है। आत्महत्या की खबरें इस गहरी खाई की गवाही देती हैं, जिसमें हम अपने भविष्य को धकेल रहे हैं।
कोचिंग इंस्टीट्यूट्स के बड़े-बड़े होर्डिंग्स, चमकदार विज्ञापन, और “AIR 1” की कहानियों के पीछे कितने अधूरे ख्वाब दफन हैं, इसका अंदाज़ा सिर्फ वो माता-पिता लगा सकते हैं जो हर महीने अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा एक ‘बेहतर कल’ की आशा में खर्च करते हैं। समस्या क्या है? सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता घट रही है।पारंपरिक कक्षाओं में बच्चों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन नहीं मिल पाता।
परीक्षा प्रणाली ऐसी है जिसमें रटने वाला जीत जाता है, समझने वाला पीछे छूट जाता है। शायद हमें फिर से उस शिक्षा की ओर लौटना होगा जो बच्चे को सिर्फ नंबर लाने की मशीन नहीं, इंसान बनने की प्रेरणा दे। स्कूलों को फिर से “गुरुकुल” बनाना होगा—जहां सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं, जीवन का पाठ पढ़ाया जाए।
कोचिंग सेंटर आज जरूरत बन चुके हैं, लेकिन यह ज़रूरत क्यों बनी, ये सोचने की सबसे बड़ी ज़रूरत है। शिक्षा एक दौड़ नहीं, एक यात्रा होनी चाहिए—जहां हर बच्चे को अपनी गति से आगे बढ़ने की आज़ादी हो।

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