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‘सुप्रीम कोर्ट ने सिविल विवादों में बढ़ती FIR पर जताई चिंता, कहा—’कोर्ट और पुलिस रिकवरी एजेंट नहीं हैं’

‘सुप्रीम कोर्ट ने सिविल विवादों में बढ़ती FIR पर जताई चिंता, कहा—’कोर्ट और पुलिस रिकवरी एजेंट नहीं हैं’

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल विवादों में लगातार एफआईआर दर्ज किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि न्यायपालिका और पुलिस वसूली के एजेंट नहीं हैं और सिविल मामलों को आपराधिक मामले में बदलना न्याय प्रणाली के लिए खतरा है। ऐसे कदम से न केवल कानून का दुरुपयोग होता है बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. के. सिंह ने कहा कि केवल आर्थिक या सिविल विवादों के लिए पुलिस द्वारा आपराधिक मामला दर्ज करना गलत है। अदालतों और पुलिस को गिरफ्तारी की धमकी देकर विवाद सुलझाने की कोशिश दुरुपयोग है। अदालत ने कहा कि पुलिस को मामले का सही प्रकार समझकर केवल उस स्थिति में एफआईआर दर्ज करनी चाहिए जब वास्तव में आपराधिक उल्लंघन हो।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को सुझाव दिया है कि वे प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करें, जो अधिमानतः सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश हों। जब भी पुलिस को यह समझने में दिक्कत हो कि मामला सिविल है या आपराधिक, तो वे नोडल अधिकारी से परामर्श कर सही निर्णय लें। इसका मकसद विवाद सुलझाने की प्रक्रिया को न्यायसंगत बनाना और कानून के दुरुपयोग को रोकना है।

कोर्ट ने याद दिलाया कि पिछले साल 1 अप्रैल को जारी फैसले में स्पष्ट किया गया था कि जिन सिविल विवादों में कोई आपराधिक अपराध शामिल नहीं है, उन्हें आपराधिक अभियोजन के माध्यम से सुलझाने की कोशिश निंदनीय है। इस साल भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिविल मामलों को आपराधिक मामलों में परिवर्तित करना स्वीकार्य नहीं है, और अगर भविष्य में ऐसा कोई मामला मिलेगा तो पुलिस पर जुर्माना लगाया जाएगा।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने कोर्ट को बताया कि पुलिस इस मामले में दोहरी चुनौतियों का सामना करती है— एफआईआर न दर्ज करने पर न्यायालय आलोचना करता है, और दर्ज करने पर पक्षपात का आरोप लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को कहा कि मामला सिविल है या आपराधिक, इसे सावधानी से परखें।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न्यायिक प्रणाली की बाध्यताओं को उजागर करती है और यह नीति बनाने की दिशा में पहला बड़ा कदम है, जो आर्थिक-सिविल विवादों को आपराधिक मामलों से अलग करेगा और न्याय प्रणाली को दुरुपयोग से बचाएगा।

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