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2027 से पहले बड़ा सवाल: उत्तर प्रदेश के लिए योगी मॉडल कितना जरूरी? कानून-व्यवस्था, रोजगार, महिला सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिपोर्ट

2027 से पहले बड़ा सवाल: उत्तर प्रदेश के लिए योगी मॉडल कितना जरूरी? कानून-व्यवस्था, रोजगार, महिला सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अब सिर्फ सत्ता बदलने या सरकार दोहराने का सवाल नहीं है, बल्कि यह भी तय करेगा कि पिछले करीब एक दशक में प्रदेश में कानून-व्यवस्था, रोजगार, महिला सुरक्षा, धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में हुए बदलावों को जनता किस नजर से देखती है। 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व के साथ-साथ एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश और रोजगार जैसे मुद्दे भी सरकार के प्रमुख दावों का हिस्सा रहे हैं।

सबसे पहले बात कानून-व्यवस्था की। उत्तर प्रदेश पुलिस और केंद्र सरकार के आंकड़ों को देखें तो अपराध की तस्वीर को केवल कुल FIR की संख्या से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि FIR बढ़ना कई बार बेहतर रिपोर्टिंग का परिणाम भी हो सकता है। NCRB के 2023 आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में IPC के तहत अपराध दर 181.3 रही, जबकि राष्ट्रीय दर 270.3 थी। सभी दर्ज अपराधों की दर उत्तर प्रदेश में 335.3 और राष्ट्रीय स्तर पर 448.3 रही। महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर यूपी में 58.6 थी, जबकि राष्ट्रीय दर 66.2 थी। बलात्कार की अपराध दर यूपी में 3.1 और राष्ट्रीय स्तर पर 4.4 रही।

हिंसक अपराधों के आंकड़ों में भी एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। NCRB के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक उत्तर प्रदेश में हिंसक अपराधों की दर 2016 में लगभग 30 प्रति लाख थी, जो 2021 में घटकर 22.7 प्रति लाख रह गई। यानी इस अवधि में करीब 24 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। हालांकि, अपराध के अलग-अलग वर्गों का रुझान एक जैसा नहीं रहा है और इसलिए कानून-व्यवस्था पर निष्कर्ष निकालते समय हर अपराध श्रेणी को अलग-अलग देखना जरूरी है।

योगी सरकार कानून-व्यवस्था को लेकर पुलिस व्यवस्था में भी बदलाव का दावा करती रही है। सरकारी जानकारी के अनुसार योगी सरकार के कार्यकाल में 2.16 लाख पुलिसकर्मियों की भर्ती की गई, जिनमें 27,178 महिलाएं शामिल हैं। इसके अलावा सात प्रमुख शहरों में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू की गई है।

महिला सुरक्षा के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश में 1090 Women Power Line, महिला हेल्प डेस्क, मिशन शक्ति और Safe City जैसे कार्यक्रम चलाए गए हैं। 2020 में Women and Child Security Organization यानी WCSO की स्थापना हुई, जिसकी इकाइयां प्रदेश के सभी 75 जिलों में हैं। यूपी पुलिस के अनुसार अप्रैल 2024 तक यौन अपराधों की जांच से जुड़े ITSSO सिस्टम में उत्तर प्रदेश का डिस्पोजल रेट 98.80 प्रतिशत दर्ज किया गया था। लखनऊ Safe City Project के तहत स्मार्ट कंट्रोल रूम और 1,000 से अधिक CCTV कैमरों का एकीकृत नेटवर्क भी बनाया गया है।

लेकिन महिला सुरक्षा का सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं है। महिलाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, तेज जांच, पुलिस की जवाबदेही और अपराध की रिपोर्टिंग की सुविधा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए 2027 में महिला सुरक्षा का मुद्दा इस बात पर भी निर्भर करेगा कि जमीन पर महिलाओं को सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था कैसी दिखाई देती है।

अब बात रोजगार की। यह उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, क्योंकि देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में युवाओं की संख्या भी बहुत बड़ी है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित जानकारी के मुताबिक पिछले आठ वर्षों में विभिन्न आयोगों और भर्ती बोर्डों के माध्यम से 8.5 लाख से ज्यादा युवाओं को सरकारी नौकरियां दी गईं। इसी सरकारी दस्तावेज में कहा गया है कि इनमें 1.38 लाख से अधिक महिलाएं शामिल हैं।

रोजगार का दूसरा बड़ा क्षेत्र MSME है। Invest UP के अनुसार उत्तर प्रदेश का MSME सेक्टर 1.65 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है। वहीं सरकार की रोजगार संबंधी रिपोर्ट में निवेश प्रस्तावों, MSME और निजी क्षेत्र से जुड़े रोजगार के बड़े आंकड़े दिए गए हैं। इन आंकड़ों को सरकारी नौकरियों से अलग समझना जरूरी है, क्योंकि निवेश से संभावित रोजगार, वास्तविक रूप से सृजित रोजगार और सरकारी नियुक्तियां तीन अलग-अलग श्रेणियां हैं।

उत्तर प्रदेश में कौशल विकास के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। सरकार के अनुसार 2017 से 2025 के बीच उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन के तहत 14,13,716 युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया और 5,66,483 युवाओं को रोजगार से जोड़ने की जानकारी दी गई है। इसका मतलब यह है कि रोजगार की लड़ाई में केवल सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि स्किल, MSME, स्वरोजगार और निजी निवेश भी बड़े हिस्से हैं।

अब आता है वह मुद्दा जो योगी आदित्यनाथ की राजनीति की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है—हिंदुत्व और सांस्कृतिक पहचान। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, काशी और धार्मिक पर्यटन का विकास तथा धार्मिक स्थलों से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को योगी सरकार की राजनीति और विकास मॉडल दोनों में प्रमुखता मिली है। इसे समर्थक सांस्कृतिक पुनर्जागरण और धार्मिक पर्यटन से जोड़ते हैं, जबकि आलोचक सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर अलग राजनीतिक दृष्टिकोण रखते हैं। इसलिए 2027 में हिंदुत्व का सवाल केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी बहस का विषय होगा कि सांस्कृतिक परियोजनाओं का पर्यटन, स्थानीय कारोबार और रोजगार पर कितना प्रभाव पड़ा।

इसी के साथ उत्तर प्रदेश का इंफ्रास्ट्रक्चर पिछले वर्षों में सरकार की सबसे ज्यादा दिखाई देने वाली प्राथमिकताओं में रहा है। एक्सप्रेसवे नेटवर्क इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। Invest UP के अनुसार गंगा एक्सप्रेसवे के संचालन के बाद उत्तर प्रदेश देश के operational expressway network का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा रखता है। राज्य में 17 घरेलू और 5 अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की दिशा में विस्तार का दावा भी किया गया है।

एयर कनेक्टिविटी की तस्वीर भी 2017 की तुलना में बदली है। Invest UP के अनुसार 2017 में उत्तर प्रदेश में केवल चार functional airports थे—लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर और आगरा—जो 25 destinations से जुड़े थे। बाद में एयरपोर्ट की संख्या बढ़ी और कई नए शहर हवाई संपर्क से जुड़े। जेवर में Noida International Airport का विकास भी राज्य के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल है।

इंफ्रास्ट्रक्चर का असर सिर्फ सड़क या एयरपोर्ट तक सीमित नहीं है। एक्सप्रेसवे के आसपास industrial corridors, logistics, warehousing और manufacturing को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है। सरकार का निवेश पोर्टल उत्तर प्रदेश को manufacturing, logistics, defence, healthcare और renewable energy जैसे क्षेत्रों के लिए investment ecosystem के रूप में प्रस्तुत करता है।

यही वह बिंदु है जहां 2027 की राजनीति कानून-व्यवस्था से आगे निकलकर रोजगार और आर्थिक विकास से जुड़ती है। सवाल यह होगा कि नई सड़कें, एक्सप्रेसवे और एयरपोर्ट कितने उद्योग खींच पाए, कितनी स्थानीय नौकरियां पैदा हुईं और युवाओं को अपने ही राज्य में बेहतर अवसर कितने मिले।

अगर पिछली सरकार और मौजूदा सरकार की तुलना करनी है तो केवल राजनीतिक दावों के आधार पर तुलना करना पर्याप्त नहीं होगा। 2016-17 के आसपास की स्थिति और आज के आंकड़ों को समान परिभाषा, समान समयावधि और समान स्रोत के आधार पर देखना होगा। उदाहरण के लिए अपराध में कुल FIR की तुलना के बजाय crime rate, violent crime rate, murder, kidnapping और crimes against women को अलग-अलग देखना ज्यादा उपयोगी है। इसी तरह रोजगार में सरकारी नियुक्ति, skill training, MSME employment और private-sector jobs को अलग-अलग रखना जरूरी है।

2027 की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश में इसलिए असली सवाल केवल यह नहीं होगा कि योगी आदित्यनाथ जरूरी हैं या नहीं। असली सवाल यह होगा कि जनता पिछले वर्षों के परिणामों को किस पैमाने पर देखती है—क्या कानून-व्यवस्था में सुधार पर्याप्त है, क्या महिलाओं को ज्यादा सुरक्षित महसूस हो रहा है, क्या युवाओं को स्थायी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार मिल रहा है, क्या हिंदुत्व और सांस्कृतिक परियोजनाओं के साथ विकास का संतुलन बना है, और क्या एक्सप्रेसवे-एयरपोर्ट जैसी परियोजनाएं जमीन पर निवेश और रोजगार में बदल रही हैं।

2027 का चुनाव इन मुद्दों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के दावों और वादों की परीक्षा भी होगा। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में सरकार के प्रदर्शन को समझने के लिए भावनाओं के साथ-साथ आंकड़ों को देखना जरूरी होगा—क्योंकि कानून-व्यवस्था, रोजगार, महिला सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर का असर सीधे आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है।

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