CM भगवंत मान के OSD राजबीर घुम्मन पहुंचे हाईकोर्ट, CBI की FIR और छापेमारी को दी चुनौती
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से दर्ज एफआईआर और उनके पैतृक निवास पर की गई छापेमारी को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी है। घुम्मन ने अदालत में याचिका दायर कर सीबीआई की जांच प्रक्रिया पर रोक लगाने और कानूनी मंजूरी मिलने तक उनके खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने की मांग की है।
राजबीर सिंह घुम्मन ने अपने वकील गिन्नीजीत मल्होत्रा के माध्यम से सिविल रिट याचिका दाखिल की है। याचिका में दलील दी गई है कि सीबीआई ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A के तहत आवश्यक पूर्व मंजूरी लिए बिना उनके खिलाफ जांच शुरू की। याचिकाकर्ता का दावा है कि उनकी आधिकारिक भूमिका और उससे जुड़े फैसलों के संबंध में जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेना जरूरी था, लेकिन इस मामले में ऐसी मंजूरी नहीं ली गई।
याचिका में कहा गया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत सरकारी कर्मचारियों के आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों या की गई सिफारिशों से संबंधित कथित अपराधों की जांच शुरू करने से पहले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक है। घुम्मन ने इसी कानूनी प्रावधान को आधार बनाते हुए सीबीआई की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, मंजूरी की आवश्यकता और उसके लागू होने को लेकर अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी।
राजबीर सिंह घुम्मन ने हाईकोर्ट से तीन प्रमुख राहत देने की मांग की है। पहली, धारा 17A के तहत आवश्यक वैधानिक मंजूरी के अभाव में सीबीआई की जांच और एफआईआर से जुड़ी कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई जाए। दूसरी, याचिका पर सुनवाई लंबित रहने के दौरान उनके खिलाफ गिरफ्तारी सहित किसी भी तरह की दबावपूर्ण या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए।
तीसरी मांग में घुम्मन ने 6 अक्टूबर को पंजाब के संगरूर जिले के घराचों गांव स्थित उनके पैतृक निवास पर की गई तलाशी और जब्ती की कार्रवाई को चुनौती दी है। याचिका में इस तलाशी की प्रक्रिया और चंडीगढ़ की विशेष अदालत द्वारा जारी सर्च वारंट को गैरकानूनी घोषित कर रद्द करने की मांग की गई है।
इस मामले में अब हाईकोर्ट की सुनवाई और उसके आदेश पर नजर रहेगी। फिलहाल याचिका में लगाए गए आरोप और कानूनी आपत्तियां याचिकाकर्ता का पक्ष हैं। सीबीआई की कार्रवाई की वैधता, जांच पर रोक और अन्य राहतों के संबंध में अंतिम स्थिति अदालत के फैसले से ही स्पष्ट होगी।