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ईरान की वो सुबह जिसने बदल दी देश की तकदीर: एक अख़बार की हेडलाइन, और फारस बन गया इस्लामिक ईरान

ईरान की वो सुबह जिसने बदल दी देश की तकदीर: एक अख़बार की हेडलाइन, और फारस बन गया इस्लामिक ईरान

आज जब ईरान और इजरायल के बीच जंग के हालात बने हैं, मिसाइलें एक-दूसरे की ज़मीन पर गिर रही हैं और दोनों देश तबाही के कगार पर हैं—ऐसे में दुनिया एक बार फिर ईरान के उस सुनहरे अतीत को याद कर रही है, जब ये मुल्क फारस कहलाता था। तब यहां आज़ादी थी, महिलाओं को बराबरी का हक था, लड़कियां स्कूल जाती थीं, मिनी स्कर्ट पहनती थीं, लिपस्टिक लगाकर घूमती थीं। लेकिन फिर एक दिन सब कुछ बदल गया—एक क्रांति आई, और वह देश जिसे मॉडर्न और प्रगतिशील कहा जाता था, इस्लामिक गणराज्य बन गया।
6 जनवरी 1978 की सुबह, ईरान के सबसे पुराने अख़बार इत्तलात में छपी एक खबर ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। उसमें लिखा था कि अयातुल्लाह खुमैनी ब्रिटेन के एजेंट हैं, और उनकी नीयत पर सवाल खड़े किए गए थे। बस फिर क्या था, लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध शुरू कर दिया। पुलिस ने गोली चलाई और 20 लोग मारे गए। वहीं से शुरू हुई वो चिंगारी जो बाद में एक भयानक इस्लामिक क्रांति में बदल गई।
अयातुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी, एक इस्लामिक स्कॉलर और धर्मगुरु थे जिनका प्रभाव 60-70 के दशक में मदरसों में बहुत गहरा था। उनका एक भारत कनेक्शन भी है—उनके दादा सैयद अहमद मुसवी हिंदी, उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के रहने वाले थे। वे इराक गए और वहीं बस गए, जहां खुमैनी का जन्म हुआ।
खुमैनी पश्चिमी संस्कृति के घोर विरोधी थे और शाह के धर्मनिरपेक्ष सुधारों को इस्लाम के खिलाफ मानते थे। क्रांति के बाद उन्होंने ही ईरान को इस्लामिक राष्ट्र में तब्दील कर दिया।
ईरान को पहले दुनिया फारस के नाम से जानती थी। ये एक समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र था, जहां रेज़ा शाह पहलवी की हुकूमत थी। उन्होंने 1925 में सत्ता संभाली और ईरान को एक पश्चिमी मॉडल वाला धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की कोशिश की।
उन्होंने महिलाओं के लिए कई सुधार किए:
1936 में हिजाब पर पाबंदी
1950 में बाल विवाह पर रोक
1963 में महिलाओं कोवोटिंग राइटऔर चुनाव लड़ने का अधिकार
महिलाएं डॉक्टर, वकील, अफसर, एयर होस्टेस, सैनिक तक बन सकती थीं
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद खुमैनी ने सत्ता संभाली और ईरान को एक कड़ाई से इस्लामी कानूनों पर चलने वाला देश बना दिया। महिलाओं के हक छीने गए, हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया, और देश धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक कट्टरपंथी इस्लामिक राष्ट्र के रूप में पहचाना जाने लगा।
आज जब ईरान-इजरायल युद्ध की आग भड़क रही है, तो एक बार फिर वो सवाल उठता है कि अगर उस दिन अखबार में वो खबर नहीं छपती, अगर लोग सड़कों पर नहीं उतरते, अगर क्रांति नहीं होती—तो क्या ईरान आज भी फारस की तरह आज़ाद, खुला और प्रगतिशील देश होता?

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