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दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से श्रीमद्भागवत साप्ताहिक कथा का भव्य आयोजन

इस कथा में सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री वैष्णवी भारती जी ने पांचवें दिवस की सभा में भगवान की लीलाओं का वर्णन किया । धर्म की स्थापना के लिए कान्हा गोपाल भी बने। गो सेवा, गो पूजन कर हमें गाय का माहात्म्य समझाया । महाभारत में दर्ज अनेकानेक उदाहरण हमें गो माता के सम्मान एवं रक्षण की प्रेरणा देते हैं । विष्णुधर्मोत्तर पुराणों में कहा गया कि गाय की सेवा से आप तैंतीस कोटि देवी-देवताओं को प्रसन्न कर सकते हैं । गो माता के पंचगव्य की बात करें तो उसमें गोमूत्र वैदिक काल से हमारे लिए लाभप्रद माना गया है । 400 से अधिक रोगों का उपचार इसी से संभव है । प्राचीन भारत में किसान बीज भूमि में रोपित करने से पूर्व धरती पर गो मूत्र छिड़क कर उसे स्वच्छ बनाते । इसे गोमूत्र संस्कार कहा जाता था । गाय के दुग्ध को सात्त्विक, मेधाशक्ति बढ़ाने वाला, अनेक रोगों को समाप्त करने वाला कहा गया । गाय को मां उसकी आध्यात्मिकता एवं वैज्ञानिकता के कारण कहा गया । परंतु अवध्या कही जाने वाली मां को काटा क्यों जा रहा है? मंगलपांडे जैसे अनेकों वीरों ने जिस गाय की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति दी । हमें उसके संरक्षण, संवर्धन के लिए कदम उठाने होंगे । उन्होंने श्री आशुतोष महाराज जी द्वारा चलाए जा रहे कामधेनु प्रकल्प के विषय में बताया । जिस के अन्तर्गत दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान भारतीय देशी नस्ल की गो प्रजातियों के संवर्धन हेतु संकल्पित है । गो के नस्ल सुधार पर कार्य किया जा रहा है । जो दुर्लभ प्रजातियां हो रही हैं उन को संरक्षित किया जा रहा है । क्योंकि गो बचेगी तो देश प्रगति कर सकेगा ।

गोवर्धन लीला के रहस्य को हमारे समक्ष बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया । नंद बाबा और गांव की ओर से इंद्रयज्ञ की तैयारियां चलते देख कर भगवान श्रीकृष्ण उनसे प्रश्न पूछते हैं । उनको गोवर्धन पर्वत तथा धरती का पूजन करने हेतु उत्साहित करते हैं । प्रभु का भाव यह था जो धरती वनस्पति जल के द्वारा हमारा पोषण कर रही है । उसकी वंदना और पूजा करनी चाहिए । धरती का प्रतीक मानकर गोवर्धन पर्वत की पूजा की गई । छप्पन व्यंजनों का भोग भगवान को दिया गया । इंद्र के अभिमान को ठेस लगी तो उसने सात दिन तक मूसलाधार बारिश के द्वारा गोकुल के लोगों को प्रताड़ित करने का प्रयास किया । परंतु भगवान ने अपनी कनिष्टिका के ऊपर धारण कर सभी की रक्षा की । यदि आप भागवत महापुराण का अध्ययन करें तो ज्ञात होगा कि प्रभु ने नंदबाबा सहित ग्राम निवासियों को कर्म के सिद्धांत का विवेचनात्मक विवेचन किया । कर्म ही मनुष्य के सुख, दुख, भय, क्षेम का कारण है । अपने कर्मानुसार मानव जन्म लेता है और मृत्यु को प्राप्त होता है । कर्म ही ईश्वर है । हम सभी नारायण के अंश हैं । हम कर्म को यश प्राप्ति के लिए नहीं करते । हम कर्म की उपासना करते हैं । कर्म ही हमारी पूजा है । “कर से कर्म करो विधि नाना। चित्त राखो जहं दया निधाना” । यह दोहा सुनने में जितना सरल है । व्यावहारिक जीवन में उसे उतारना उतना ही कठिन है । यदि एक पूर्ण गुरु का सान्निध्य प्राप्त हो जाए तो वो घट में ही स्थित प्रभु का दर्शन करवाते हैं । साथ ही साथ श्वासों में चल रहे हरि के शाश्वत नाम को प्रकट भी करते हैं । यूं तो संसार में भगवान के अनेकों नाम प्रचलित हैं । परंतु मोक्ष का मार्ग भीतरी नाम ही प्रशस्त करता है ।

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