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UN पर मंडरा रहा संकट? मोदी–ट्रंप दोनों उठा रहे सवाल, IBSA क्या है और क्यों जरूरी

UN पर मंडरा रहा संकट? मोदी–ट्रंप दोनों उठा रहे सवाल, IBSA क्या है और क्यों जरूरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज दक्षिण अफ्रीका की दो दिवसीय यात्रा पर रवाना हो रहे हैं, जहां वह जोहांसबर्ग में होने वाले जी20 सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इसी दौरान वह एक बेहद महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय मंच—IBSA—की बैठक में भी शामिल होंगे। भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का यह समूह वैश्विक राजनीति में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को मजबूत करने के लिए बनाया गया था। खास बात यह है कि IBSA संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और भारत, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका को स्थायी सदस्यता दिलाने की वकालत करता है।

IBSA की शुरुआत साल 2003 में ब्रासीलिया घोषणा-पत्र के साथ हुई थी। तीन महाद्वीपों के लोकतांत्रिक देशों के इस गठबंधन का उद्देश्य दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देना है। इसमें विकास, गरीबी उन्मूलन, व्यापार, निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर मिलकर काम किया जाता है। लेकिन इस समूह का सबसे बड़ा लक्ष्य है—UNSC की पुरानी संरचना में सुधार कर नई वैश्विक हकीकतों के अनुसार उसे मजबूत बनाना।

UNSC में फिलहाल सिर्फ पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन। ये देश वीटो पावर रखते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले और सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं वाले देश—भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका—का इस सूची में न होना आज के समय में असंतुलन को दर्शाता है। यही कारण है कि IBSA लगातार UNSC में विस्तार की मांग कर रहा है ताकि वैश्विक मंच पर न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।

प्रधानमंत्री मोदी भी कई बार संयुक्त राष्ट्र को सुधारने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं। उनका साफ कहना है कि अगर UN 21वीं सदी की चुनौतियों के अनुरूप खुद को अपडेट नहीं करेगा तो वह अप्रासंगिक हो जाएगा। उनका मानना है कि दुनिया बदल चुकी है, लेकिन वैश्विक संस्थाओं की संरचना अभी भी दूसरी विश्व युद्ध के बाद वाले दौर जैसी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इसी विचार को कई बार दोहरा चुके हैं।

दूसरी ओर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी संयुक्त राष्ट्र की कार्यशैली पर खुलकर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने इसे ‘बेकार’ बताते हुए कहा था कि यह संस्था अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में असफल रही है। जब दुनिया के बड़े नेता लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हों, तब यह साफ हो जाता है कि UN में सुधार अब सिर्फ सुझाव नहीं, बल्कि समय की मांग बन चुका है।

IBSA की मांग है कि भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को न केवल UNSC में स्थायी सदस्यता दी जाए, बल्कि इन्हें वीटो पावर भी मिले। इस गठबंधन का मानना है कि वैश्विक निर्णय तभी निष्पक्ष और संतुलित होंगे जब उभरती शक्तियों को भी बराबरी की भूमिका मिलेगी।

दक्षिण अफ्रीका में होने वाली यह बैठक इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। दुनिया जिस नए भू-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर रही है, उसमें IBSA जैसे मंच वैश्विक बहुपक्षीयता को नया आकार देने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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