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कर्नाटक में सीएम कुर्सी की जंग तेज—क्या कांग्रेस बचा पाएगी अपना आख़िरी बड़ा किला?

कर्नाटक में सीएम कुर्सी की जंग तेज—क्या कांग्रेस बचा पाएगी अपना आख़िरी बड़ा किला?

बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस अब एक और बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रही है। पार्टी के सामने अपने अंतिम बड़े गढ़ कर्नाटक को बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है, जहां मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच सत्ता को लेकर तनाव खुलकर सामने आ चुका है। इस विवाद का असर अब दिल्ली तक पहुंच गया है, जिससे राज्य सरकार का स्थायित्व सवालों के घेरे में है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, डीके शिवकुमार के करीबी कई विधायक रविवार रात से दिल्ली में मौजूद हैं। बताया जा रहा है कि ये सभी विधायक पार्टी हाईकमान से मिलकर यह जानना चाहते हैं कि सीएम बदलने पर नेतृत्व का क्या रुख है। हालांकि इन विधायकों की मुलाकात न तो राहुल गांधी, न मल्लिकार्जुन खरगे, और न ही किसी शीर्ष नेतृत्व से हो सकी है। यहां तक कि उन्होंने केसी वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला से संपर्क करने की भी कोशिश की, लेकिन वह भी असफल रही। विधायक साफ कह रहे हैं कि वे दिल्ली किसी दबाव में नहीं, बल्कि स्थिति स्पष्ट करने के लिए आए हैं।

कर्नाटक में विवाद तब गहराया जब डीके शिवकुमार खेमा यह दावा करने लगा कि 2023 विधानसभा चुनावों के बाद पार्टी नेतृत्व ने “ढाई-ढाई साल का सीएम फॉर्मूला” तय किया था। यानी पहले ढाई साल सिद्दारमैया सीएम रहेंगे और बाकी कार्यकाल के लिए डीके शिवकुमार को जिम्मेदारी मिलेगी। हालांकि सिद्दारमैया खेमा ऐसे किसी समझौते से साफ इनकार करता है। इस बीच बतौर सीएम सिद्दारमैया के ढाई साल पूरे हो चुके हैं, जिसके बाद विवाद और तेज हो गया है।

चुनाव नतीजों के ठीक बाद 14 नवंबर को दोनों नेताओं ने दिल्ली का दौरा किया था। सिद्दारमैया ने राहुल गांधी से मुलाकात की और कहा कि मंत्रिमंडल विस्तार पर कोई चर्चा नहीं हुई। वहीं डीके शिवकुमार ने खरगे से मुलाकात की। उसी दौरान यह खबर भी उड़ी कि डीके शिवकुमार का खेमा परोक्ष रूप से भाजपा के संपर्क में है, हालांकि कर्नाटक भाजपा ने इसे सिरे से नकार दिया।

कांग्रेस के लिए कर्नाटक बेहद अहम है, क्योंकि यह पार्टी का अंतिम बड़ा राज्य है जहां वह अपने दम पर सत्ता में है। इसके अलावा पार्टी की सरकार तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में भी है, लेकिन ये दोनों अपेक्षाकृत छोटे राज्य हैं। ऐसे में कर्नाटक में सत्ता संघर्ष पार्टी हाईकमान के लिए बड़ी चिंता का विषय बन चुका है।

सिद्दारमैया राज्य के सबसे अनुभवी और मजबूत नेता माने जाते हैं। वे आठ साल तक सीएम रह चुके हैं और पांच साल विपक्ष के नेता भी रहे हैं। वहीं डीके शिवकुमार संगठन के बेहद आक्रामक और प्रभावी नेता हैं, जिनकी रणनीति ने 2023 में कांग्रेस को सत्ता में वापसी दिलाने में अहम भूमिका निभाई। दोनों नेताओं की महत्वाकांक्षा और कर्नाटक कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान ने पार्टी नेतृत्व को कठिन फैसलों की स्थिति में ला खड़ा किया है।

कर्नाटक में यह शक्ति संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर है। हाईकमान किस पक्ष को तवज्जो देता है—यह राज्य सरकार और कांग्रेस दोनों के भविष्य का फैसला करेगा।

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