मुख्य सामग्री पर जाएं
ब्रेकिंग न्यूज़
तरुण तेजपाल को बड़ा झटका! यौन उत्पीड़न केस में हाईकोर्ट ने ठहराया दोषी भगवंत सरकार कैबिनेट ने ‘पंजाब रेगुलेशन ऑफ फीस ऑफ अन-एडेड एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (संशोधन) विधेयक-2026’ सहित कई जनहित के कार्यों को दी मंजूरी ‘क्या हमारी कीमत कीड़े-मकौड़ों से भी कम है?’ झारखंड के आंदोलनकारी छात्रों का फूटा गुस्सा किसी का कान फटा, किसी का कंधा खिसका’—एअर इंडिया फ्लाइट के यात्रियों ने सुनाई दहला देने वाली आपबीती हवा में हड़कंप! टर्बुलेंस में फंसी एअर इंडिया की फुकेट-दिल्ली फ्लाइट, कई यात्री घायल पटना में बनेगा PM मोदी का मंदिर, बिहार किन्नर कल्याण बोर्ड की बैठक में बड़ा फैसला CM योगी का बड़ा लक्ष्य, इस बार 5 करोड़ घरों पर फहराएगा तिरंगा भगवा वेश में प्रदर्शन पड़ा भारी! राहुल गांधी, पप्पू यादव और अवधेश प्रसाद के खिलाफ केस दर्ज उमर खालिद की जमानत याचिका पर दिल्ली पुलिस को हाई कोर्ट का नोटिस SCO समिट के लिए पीएम मोदी को न्योता भेजने की तैयारी में पाकिस्तान, क्या इस्लामाबाद जाएंगे प्रधानमंत्री?

जाति नहीं योग्यता की राजनीति: नितिन नबीन के जरिए पीएम मोदी का नैरेटिव शिफ्ट

जाति नहीं योग्यता की राजनीति: नितिन नबीन के जरिए पीएम मोदी का नैरेटिव शिफ्ट

भारतीय जनता पार्टी ने नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर एक ऐसा राजनीतिक संकेत दिया है, जिसे केवल संगठनात्मक नियुक्ति के रूप में नहीं देखा जा रहा। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब बिहार से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक जाति आधारित वोट बैंक चर्चा के केंद्र में है। बेहद सीमित आबादी वाली कायस्थ जाति से आने वाले नितिन नबीन को इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ संदेश दिया है कि उनकी राजनीति में संख्या नहीं, क्षमता सबसे बड़ा पैमाना है।

बिहार की कुल आबादी में कायस्थ समुदाय की हिस्सेदारी महज 0.6 प्रतिशत मानी जाती है। इसके बावजूद बीजेपी का यह फैसला यह दर्शाता है कि पार्टी जातिगत गणित से ऊपर उठकर नेतृत्व को तरजीह दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम उस सोच को चुनौती देता है, जहां चुनावी रणनीतियां केवल यादव, कुशवाहा या अन्य बड़े जातीय समूहों की संख्या के आधार पर तय होती रही हैं। नितिन नबीन का उभार उस राजनीति का प्रतीक बनकर उभरा है, जो योग्यता और समर्पण को प्राथमिकता देती है।

हालिया बिहार जातिगत जनगणना के अनुसार, राज्य में कायस्थों की संख्या करीब 7.8 लाख बताई गई है, हालांकि कई सामाजिक संगठन इन आंकड़ों पर सवाल भी उठाते रहे हैं। बावजूद इसके, ऐतिहासिक रूप से कायस्थ समुदाय का प्रभाव प्रशासनिक, बौद्धिक और शहरी क्षेत्रों में हमेशा मजबूत रहा है। यही वजह है कि इसे सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि एक ‘इन्फ्लुएंस बैंक’ के रूप में देखा जाता है। नितिन नबीन का चयन इस प्रभाव की राजनीतिक स्वीकार्यता भी माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक नजरिया लंबे समय से जाति को विभाजन का नहीं, बल्कि जोड़ने का माध्यम बनाने पर केंद्रित रहा है। उनका मानना रहा है कि अगर किसी वर्ग की आबादी कम है, लेकिन उसकी योग्यता और योगदान ज्यादा है, तो नेतृत्व का पैमाना वही होना चाहिए। नितिन नबीन की नियुक्ति बिहार की उस राजनीति को सीधी चुनौती देती है, जहां दशकों से जातिगत समीकरणों के आधार पर सत्ता की बिसात बिछाई जाती रही है।

देश के अन्य राज्यों में भी कायस्थ समुदाय की आबादी सीमित है, लेकिन उसका प्रभाव व्यापक माना जाता है। उत्तर प्रदेश में करीब 0.8 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में लगभग 2.7 प्रतिशत, दिल्ली में अनुमानित 2–3 प्रतिशत और मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व पंजाब जैसे राज्यों में यह संख्या और भी कम है। इसके बावजूद शहरी इलाकों, प्रशासन और शिक्षा के क्षेत्र में इस समुदाय की भूमिका निर्णायक रही है। यही कारण है कि बीजेपी का यह कदम केवल बिहार तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर असर डालने वाला माना जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, नितिन नबीन की एंट्री ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बीजेपी कास्ट कार्ड से ज्यादा काबिलियत का दांव खेलने को तैयार है। बिहार में जहां कायस्थ आबादी 0.6 प्रतिशत है, वहीं सरकारी सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व करीब 6 प्रतिशत से अधिक बताया जाता है। यह आंकड़ा इस समुदाय की शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षमता को दर्शाता है, जिसे अब राजनीतिक मंच पर भी पहचान मिलती दिख रही है।

आज जब देश की राजनीति में कास्ट सेंसस और जातिगत ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे जोर पकड़ रहे हैं, ऐसे समय में नितिन नबीन का चयन एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता है। यह फैसला न सिर्फ विपक्ष की जाति-केंद्रित रणनीतियों को चुनौती देता है, बल्कि बीजेपी के उस दावे को भी मजबूत करता है कि वह विकास, सुशासन और समावेशिता को केंद्र में रखकर राजनीति करना चाहती है।

45 वर्षीय नितिन नबीन, जो बिहार में पांच बार विधायक रह चुके हैं और संगठन से लेकर सरकार तक का अनुभव रखते हैं, अब राष्ट्रीय स्तर पर एक नई भूमिका में सामने हैं। उनका उभार इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पीएम मोदी की खींची गई यह ‘बड़ी लकीर’ आने वाले समय में भारतीय राजनीति के नैरेटिव को बदल सकती है—जहां पहचान जाति से नहीं, बल्कि काम और काबिलियत से तय होगी।

Share This
अगला लेख → परदादा थे राजा, आज खुद बन गए निशाना: कबड्डी स्टार राणा बलाचौ…

टिप्पणी करें

Your email address will not be published. Required fields are marked *

बाज़ार
सेंसेक्स 78,499 -456 (-0.58%)
निफ्टी 24,571 -65 (-0.26%)
मौसम
22°C
Partly Cloudy
💧 90% 💨 5 km/h
Dehradun