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बांदा जिला पंचायत में करोड़ों का कथित घोटाला, जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी अध्यक्ष पर कार्रवाई नहीं

बांदा जिला पंचायत में करोड़ों का कथित घोटाला, जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी अध्यक्ष पर कार्रवाई नहीं

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में जिला पंचायत से जुड़ा एक गंभीर भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। यह प्रकरण जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील पटेल पर लगे करोड़ों रुपये के गबन और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों से जुड़ा है, जिसकी जांच के बाद भी अब तक निर्णायक कार्रवाई न होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

मामला वित्तीय वर्ष 2022–23 का है, जब जिला पंचायत बांदा में खनिज तहबाजारी के अंतर्गत ठेकों की ई-नीलामी की गई। आरोप है कि नीलामी तो पुरानी दरों पर स्वीकृत की गई, लेकिन बाद में जारी किए गए कार्यादेश नई दरों पर, यानी लगभग दो गुना बढ़ाकर किए गए। इस प्रक्रिया में करीब दो करोड़ सात लाख रुपये के अंतर की बात सामने आई, जिसे लेकर जिला पंचायत सदस्यों ने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत के बाद मामले की जांच तत्कालीन जिलाधिकारी महोबा द्वारा की गई, जिसमें जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील पटेल सहित कुछ पूर्व अधिकारी दोषी पाए गए। जांच के आधार पर संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई भी हुई और शासन की ओर से जुलाई 2025 में सुनील पटेल को उनके अधिकार सीज किए जाने को लेकर नोटिस जारी किया गया। हालांकि, आरोप है कि नोटिस जारी होने के बावजूद वे अब भी अपने पद पर प्रभाव बनाए हुए हैं और कार्यालय में बैठकर कार्य कर रहे हैं।

आरोप लगाने वालों का कहना है कि इस मामले से जुड़ी पत्रावलियां जब भी शासन स्तर तक पहुंचती हैं, तो उन्हें मंत्री स्तर पर आपत्तियां लगाकर वापस कर दिया जाता है, जिससे कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसी कारण यह सवाल उठ रहा है कि जब जांच में दोष सिद्ध हो चुका है, तो अब तक निर्णायक कदम क्यों नहीं उठाए गए।

इस पूरे मामले की तुलना फतेहपुर जिले के एक अन्य प्रकरण से की जा रही है, जहां संतोष द्विवेदी सरकंडी की पत्नी को कथित तौर पर हजारों रुपये के गबन के मामले में पुलिस ने रात करीब दो बजे हिरासत में लिया और बाद में जेल भेज दिया। इस कार्रवाई के तरीके और समय को लेकर भी स्थानीय स्तर पर काफी नाराजगी देखी गई।

इन दोनों मामलों को सामने रखकर कुछ सामाजिक संगठनों और लोगों का कहना है कि प्रदेश में कानून के समान अनुप्रयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उनका आरोप है कि प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों को संरक्षण मिल रहा है, जबकि आम नागरिकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है। प्रदेश में इस तरह के भेदभावपूर्ण व्यवहार के और भी उदाहरण होने का दावा किया जा रहा है, जिस पर सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।

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