पीडीए फॉर्मूले से 2027 जीतने की कोशिश, अखिलेश यादव ने बनाया खास सियासी प्लान
2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा दांव खेलने की तैयारी शुरू कर दी है। सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ पार्टी ने अपनी रणनीति का केंद्र दलित वोटबैंक को बनाया है, जो अब तक पारंपरिक रूप से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का मजबूत आधार माना जाता रहा है। सपा नेतृत्व का मानना है कि दलित मतदाताओं को अपने साथ जोड़कर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को कड़ी चुनौती दी जा सकती है।
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की योजना के तहत पार्टी 2027 के चुनाव में केवल आरक्षित सीटों तक सीमित न रहते हुए सामान्य सीटों पर भी बड़ी संख्या में दलित उम्मीदवारों को टिकट देने पर विचार कर रही है। यह रणनीति अखिलेश यादव के चर्चित ‘पीडीए’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का हिस्सा है, जिसके जरिए पार्टी व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार करना चाहती है। अखिलेश यादव कई मौकों पर कह चुके हैं कि “पीडीए ही यूपी का भविष्य है”, और इसी सोच के तहत पार्टी अपनी सियासी बिसात बिछा रही है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनावों में दलित वोटों का एक हिस्सा सपा की ओर झुका था, जिससे पार्टी का हौसला बढ़ा है। अब इसी रुझान को विधानसभा चुनावों में स्थायी रूप देने के लिए सपा ने जमीनी स्तर पर काम तेज कर दिया है। उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित हैं। सपा की नजर इन 84 सीटों के साथ-साथ सामान्य सीटों पर भी दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने पर है।
इसी रणनीति के तहत पार्टी ने 2025 से ‘पीडीए चर्चा’ कार्यक्रम की शुरुआत की है, जो सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में चलाए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है, ताकि दलित समुदाय के बीच भरोसा मजबूत किया जा सके और पार्टी की पकड़ बढ़ाई जा सके।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा का यह कदम जोखिम भरा भी हो सकता है। सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवारों को उतारने से ऊंची जातियों के वोट खिसकने की आशंका जताई जा रही है। बावजूद इसके, 2024 के चुनावी अनुभव के आधार पर सपा नेतृत्व को भरोसा है कि यह रणनीति पार्टी को नई सियासी धार दे सकती है।
कुल मिलाकर, अखिलेश यादव की यह नई सियासी प्लानिंग न सिर्फ बसपा बल्कि भाजपा के लिए भी चिंता बढ़ाने वाली मानी जा रही है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि सपा का यह प्रयोग उत्तर प्रदेश की राजनीति में कितना बड़ा बदलाव ला पाता है।