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किस शासक ने बाबर को किया बेदखल, कैसे छिनी उसकी सल्तनत?

किस शासक ने बाबर को किया बेदखल, कैसे छिनी उसकी सल्तनत?

मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर को आमतौर पर एक विजेता बादशाह के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उनकी सफलता के पीछे संघर्ष, पराजय और बेघर होने की लंबी कहानी छिपी है। 14 फरवरी 1483 को फ़रग़ना (वर्तमान उज़्बेकिस्तान) में जन्मे बाबर ने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में ऐसे कठिन दिन देखे, जब उनके अपने सैनिक और सरदार भी साथ छोड़ने लगे थे।

महज 12 वर्ष की उम्र में पिता उमर शेख मिर्ज़ा की मृत्यु के बाद बाबर को फ़रग़ना की गद्दी संभालनी पड़ी। कम उम्र में सत्ता संभालना आसान नहीं था। दरबार के भीतर साज़िशें, रिश्तेदारों की महत्वाकांक्षा और पड़ोसी शासकों की निगाहें उनकी रियासत पर टिकी थीं। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) में इन परिस्थितियों का ईमानदारी से वर्णन किया है।

समरकंद पर अधिकार बाबर का बड़ा सपना था। 1497 में उन्होंने संघर्ष के बाद समरकंद जीत लिया, लेकिन यह सफलता ज्यादा दिन टिक नहीं सकी। समरकंद जीतने के दौरान ही फ़रग़ना में विद्रोह हो गया और कुछ ही समय में बाबर दोनों रियासतों से हाथ धो बैठे। यह उनके जीवन का सबसे कठिन दौर माना जाता है। बाबरनामा में उल्लेख मिलता है कि इन वर्षों में उन्हें पहाड़ों में भटकना पड़ा, कई बार भोजन और वस्त्र तक की कमी झेलनी पड़ी और खुले आसमान के नीचे रातें बितानी पड़ीं।

1498 से 1504 के बीच बाबर लगातार अपने खोए हुए प्रदेशों को वापस पाने की कोशिश करते रहे, लेकिन उज़्बेक शासक मुहम्मद शायबानी ख़ान के सामने उन्हें बार-बार पराजय का सामना करना पड़ा। इस दौरान कुछ सरदारों ने भी संकट की घड़ी में उनका साथ छोड़ दिया। यह समय उनके लिए न केवल राजनीतिक बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद कठिन था।

1504 में बाबर ने काबुल पर अधिकार किया, जो उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। हालांकि शुरुआती वर्षों में यहां भी चुनौतियां थीं, लेकिन काबुल ने उन्हें स्थिर आधार दिया। यहीं उन्होंने अपने व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष विकसित किया—एक कवि, प्रकृति-प्रेमी और संवेदनशील लेखक के रूप में। उन्होंने बाग़ लगाए और अपने अनुभवों को साहित्यिक रूप दिया।

मध्य एशिया में बार-बार की असफलताओं ने बाबर को नई दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया। अंततः 1526 में पहली पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी को हराकर उन्होंने हिंदुस्तान में मुगल सत्ता की नींव रखी। इतिहासकारों का मानना है कि यदि बाबर को समरकंद और फ़रग़ना में स्थायी सफलता मिल जाती, तो शायद वे भारत की ओर रुख न करते।

बाबर के सबसे बुरे दिन वही थे जब वे एक बेघर राजकुमार की तरह मध्य एशिया में भटक रहे थे। लेकिन यही संघर्ष आगे चलकर उन्हें एक व्यावहारिक और दूरदर्शी शासक बनाने में सहायक बना। उनकी आत्मकथा की स्पष्टवादिता यह दिखाती है कि महान विजेता बनने से पहले उन्होंने असफलताओं और कठिनाइयों का गहरा अनुभव किया था।

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