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सर्वदलीय बैठक से वॉकआउट पर सुदीप बंद्योपाध्याय का पलटवार, बोले- NCPI को चुनाव आयोग ने दी है मान्यता

नई दिल्ली, 19 जुलाई 2026। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसदों की मौजूदगी को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। विपक्षी दलों ने बैठक में नवगठित नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के नेताओं को आमंत्रित किए जाने का विरोध […]

सर्वदलीय बैठक से वॉकआउट पर सुदीप बंद्योपाध्याय का पलटवार, बोले- NCPI को चुनाव आयोग ने दी है मान्यता

नई दिल्ली, 19 जुलाई 2026। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसदों की मौजूदगी को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। विपक्षी दलों ने बैठक में नवगठित नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के नेताओं को आमंत्रित किए जाने का विरोध करते हुए प्रतीकात्मक वॉकआउट किया। वहीं, एनसीपीआई नेता और पूर्व टीएमसी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उनकी पार्टी को चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार किसी सर्वदलीय बैठक से विपक्ष को वॉकआउट करते देखा है। उनका कहना था कि एनसीपीआई अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का सबसे बड़ा सहयोगी दल बन चुकी है और चुनाव आयोग की मान्यता मिलने के बाद पार्टी को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। उन्होंने बताया कि सांसद काकोली घोष दस्तीदार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सभी आवश्यक दस्तावेज सौंप रही हैं।

“टीएमसी अब छोटी पार्टी बन गई”

बंद्योपाध्याय ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी के 20 लोकसभा सांसद एनसीपीआई में शामिल हो चुके हैं। उनके अनुसार अब टीएमसी के पास केवल आठ सांसद बचे हैं, इसलिए उसे लोकसभा में पहले की तरह प्रमुख स्थान मिलने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि संसद में सीटों का निर्धारण अब नए संख्या बल के आधार पर होना चाहिए।

विपक्ष ने सरकार पर उठाए सवाल

दूसरी ओर, टीएमसी और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताई। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बागी सांसदों की सदस्यता और उनकी स्थिति पर अंतिम निर्णय से पहले ही सरकार ने उन्हें अलग राजनीतिक पहचान देकर संसदीय परंपराओं का उल्लंघन किया है।

विपक्ष का कहना है कि जब तक लोकसभा अध्यक्ष दलबदल संबंधी याचिकाओं पर फैसला नहीं सुनाते, तब तक इन सांसदों को अलग दल के रूप में मान्यता देना उचित नहीं है। इसी विरोध के चलते विपक्षी नेताओं ने सर्वदलीय बैठक से वॉकआउट किया।

सरकार ने किया फैसले का बचाव

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि एनसीपीआई ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष आधिकारिक मान्यता का दावा प्रस्तुत किया है। ऐसे में सरकार का दायित्व था कि सभी संबंधित दलों को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी समूह को केवल राजनीतिक विवाद के आधार पर बैठक से बाहर नहीं रखा जा सकता।

लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी नजर

सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि टीएमसी द्वारा 20 सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग पर अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को करना है। उन्होंने कहा कि यदि अध्यक्ष को लगेगा कि अयोग्यता बनती है तो वे कार्रवाई करेंगे और यदि उन्हें अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए तो वह भी स्पष्ट हो जाएगा।

पहले भी लिया जा चुका है अहम फैसला

गौरतलब है कि मानसून सत्र से पहले ही लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दी थी। इसके साथ ही टीएमसी के बागी सांसदों को भी लोकसभा में अलग बैठने की अनुमति दिए जाने की खबरों ने इस विवाद को और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया है।

मानसून सत्र में बढ़ सकता है टकराव

मानसून सत्र की शुरुआत से पहले एनसीपीआई की मान्यता और टीएमसी के बागी सांसदों की संसदीय स्थिति को लेकर पैदा हुआ विवाद संसद के भीतर भी गरमाने के संकेत दे रहा है। अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के अगले फैसले और संसद में इन सांसदों की औपचारिक स्थिति पर टिकी हैं। विपक्ष जहां इसे लोकतांत्रिक परंपराओं का उल्लंघन बता रहा है, वहीं सरकार इसे संसदीय प्रक्रिया के अनुरूप कदम बता रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा मानसून सत्र के प्रमुख राजनीतिक विवादों में शामिल हो सकता है।

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