सिंधु जल संधि पर भारत का बड़ा फैसला, हेग कोर्ट का आदेश ठुकराया, UNHRC में उठा IWT की समीक्षा का मुद्दा
सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद एक बार फिर गहरा गया है। द हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (Court of Arbitration) की ओर से दिए गए हालिया फैसले को भारत ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। भारत का कहना है कि संधि को लेकर शुरू की गई मौजूदा मध्यस्थता प्रक्रिया ही उसकी आपत्तियों के कारण वैध नहीं मानी जा सकती। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद यानी UNHRC में एक भारतीय गैर-सरकारी संगठन (NGO) ने सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग उठाई है, जिससे पाकिस्तान की चिंताएं और बढ़ गई हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर वर्ष 1960 में हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं। लंबे समय तक यह समझौता दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का आधार बना रहा। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में सीमा पार आतंकवाद, जल परियोजनाओं और नदियों के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता गया है।
पाकिस्तान लंबे समय से संधि के तहत पश्चिमी नदियों के ऊपरी बेसिन क्षेत्रों में भारत की ओर से बनाए जा रहे या प्रस्तावित बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन पर सवाल उठाता रहा है। खास तौर पर रातले (Ratle) और किशनगंगा (Kishenganga) जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आए हैं। वर्ष 2022 के बाद भारत ने इन मामलों से जुड़े न्यूट्रल एक्सपर्ट की बैठकों में भी हिस्सा लिया था।
हालांकि, अप्रैल 2025 में पाकिस्तान की ओर से संधि को एकतरफा तौर पर सस्पेंड करने की घोषणा के बाद विवाद और जटिल हो गया। इसके बाद संधि से जुड़े विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया प्रभावित हुई और दोनों देशों के बीच जल विवाद को लेकर कानूनी तथा कूटनीतिक टकराव बढ़ता गया।
इसी बीच, द हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने भारत द्वारा सिंधु जल संधि को सस्पेंड करने के कदम को संधि के प्रावधानों के संदर्भ में अनुचित ठहराने वाली राय दी। भारत ने इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया है। नई दिल्ली का तर्क है कि पाकिस्तान द्वारा संधि की प्रक्रिया को एकतरफा तरीके से प्रभावित किए जाने के बाद इस मामले में मध्यस्थता की वैधता पर ही सवाल उठते हैं।
अब इस विवाद का एक नया पहलू संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में सामने आया है। एक भारतीय NGO ने सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग उठाते हुए कहा है कि वर्ष 1960 में बनी इस व्यवस्था को आज की बदली हुई परिस्थितियों के संदर्भ में दोबारा देखने की जरूरत है। NGO ने पानी की सुरक्षा और उससे जुड़े मानवाधिकारों के पहलू को अपनी मांग का आधार बनाया है।
सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ता विवाद केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर दोनों देशों की जल सुरक्षा और भविष्य की जल परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है। पाकिस्तान लंबे समय से सिंधु नदी प्रणाली के पानी पर अपनी निर्भरता को लेकर संवेदनशील रहा है। ऐसे में संधि से जुड़ी अनिश्चितता बढ़ने पर वहां पानी की उपलब्धता और कृषि व्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
फिलहाल भारत का रुख साफ है कि वह कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं करता। वहीं पाकिस्तान इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में आने वाले समय में सिंधु जल संधि को लेकर कानूनी, कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।