सुप्रीम कोर्ट को जमानत पर सलाह देना ट्रायल जज को पड़ा भारी, कोर्ट ने मांगी सफाई
पश्चिम बंगाल से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के एक जज के पत्र पर नाराजगी जताते हुए उनसे सफाई मांगने का निर्देश दिया है। मामला करीब पांच साल से जेल में बंद एक आरोपी के ट्रायल में हो रही देरी से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही ट्रायल कोर्ट को तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था, लेकिन तय समय में सुनवाई पूरी नहीं हो सकी।
मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि बारासात, उत्तर 24 परगना की तीसरी अदालत के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने ट्रायल पूरा करने के लिए और समय मांगते हुए सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार को पत्र भेजा था। यह पत्र 11 अगस्त को भेजा गया था। ट्रायल पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय मांगना पत्र का मुख्य विषय था, लेकिन उसमें जमानत से जुड़े मुद्दे पर भी अदालत को कुछ सुझाव दिए गए थे।
जब यह पत्र सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने रखा गया तो जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने पत्र में जमानत को लेकर दी गई सलाह पर आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के पीठासीन अधिकारी का काम सुप्रीम कोर्ट को यह बताना नहीं है कि किसी परिस्थिति में जमानत दी जानी चाहिए या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि संबंधित ट्रायल जज से इस मामले में जल्द से जल्द उचित सफाई मांगी जाए। पीठ ने पत्र के आखिरी दो पैराग्राफ पर भी नाराजगी जाहिर की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह नहीं बताया गया है कि जज ने जमानत को लेकर पत्र में वास्तव में क्या सलाह दी थी।
यह पूरा मामला उस आरोपी की जमानत याचिका से जुड़ा है, जो करीब पांच साल से अंडरट्रायल कैदी के तौर पर जेल में बंद है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट को तीन महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि ट्रायल पूरा होने के बाद इसकी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जाए।
हालांकि, निर्धारित समय सीमा में सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद ट्रायल कोर्ट की ओर से सुप्रीम कोर्ट से अतिरिक्त समय की मांग की गई। इसी पत्र में जमानत से संबंधित टिप्पणी किए जाने के कारण अब ट्रायल जज से स्पष्टीकरण मांगा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी मामले की सुनवाई में हो रही देरी को गंभीरता से लिया था। कोर्ट के सामने यह तथ्य था कि आरोपी लंबे समय से जेल में है और मामले में ट्रायल पूरा नहीं हुआ है। इसी वजह से अदालत ने सुनवाई को जल्द पूरा करने के निर्देश दिए थे।
अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से मांगी गई सफाई के बाद संबंधित ट्रायल जज को यह स्पष्ट करना होगा कि अतिरिक्त समय मांगने वाले पत्र में जमानत के मुद्दे पर सलाह देने की आवश्यकता क्यों पड़ी। मामले में आगे की कार्रवाई ट्रायल जज की ओर से दिए जाने वाले स्पष्टीकरण के बाद तय होगी।