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AUKUS की धरती से चीन की मिसाइलों तक — जिरकोनियम की रहस्यमयी सप्लाई लाइन

AUKUS की धरती से चीन की मिसाइलों तक — जिरकोनियम की रहस्यमयी सप्लाई लाइन

चीन का जिरकोनियम सीक्रेट अब दुनिया की नई भू-राजनीतिक चिंता बन गया है। यह वही खनिज है जो न केवल न्यूक्लियर रिएक्टरों में इस्तेमाल होता है, बल्कि हाइपरसोनिक मिसाइल जैसी एडवांस सैन्य तकनीकों की रीढ़ भी माना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि चीन के पास भले ही रेयर अर्थ मिनरल्स का बड़ा भंडार हो, लेकिन जिरकोनियम की पर्याप्त मात्रा उसके पास नहीं है। इसके 74 फीसदी रिजर्व ऑस्ट्रेलिया की जमीन में हैं, और यही बात इस कहानी को रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना देती है।

ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन के साथ AUKUS सिक्योरिटी अलायंस का हिस्सा है — यानी वही समूह जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव को रोकने के लिए बना था। लेकिन अब स्थिति उलटती दिख रही है। चीन की कंपनियां ऑस्ट्रेलिया की जिरकोनियम माइनिंग कंपनियों में हिस्सेदारी खरीद रही हैं और अप्रत्यक्ष रूप से अपनी सप्लाई लाइन मजबूत कर रही हैं। वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की दो बड़ी कंपनियों — Image Resources और Astron Corporation — में चीन की कंपनियों का बड़ा निवेश है। इनमें से Image Resources में चीन की LB Group सबसे बड़ी शेयरहोल्डर है।

ऑस्ट्रेलिया के डिफेंस मिनिस्टर रिचर्ड मार्ल्स भी मानते हैं कि “चीन हमारा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है, लेकिन वही सबसे बड़ा सिक्योरिटी रिस्क भी है।” रणनीतिक विशेषज्ञ डेविड किलकुलन का कहना है कि चीन की “मिलिट्री-सिविल फ्यूजन” पॉलिसी खतरनाक है, क्योंकि जो भी तकनीक सिविल रिसर्च में विकसित होती है, वह सीधे उसकी सेना PLA के काम में आती है।

जिरकोनियम इतना अहम क्यों है, इसे समझने के लिए जानना जरूरी है कि यह मेटल न्यूक्लियर फ्यूल रॉड्स में इस्तेमाल होता है, क्योंकि यह न्यूट्रॉन को बहुत कम अवशोषित करता है और बेहद उच्च तापमान सह सकता है। यही कारण है कि हाइपरसोनिक मिसाइल्स के ढांचे और कंपोनेंट्स में भी इसका इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक उत्पादित जिरकोनियम का 90% हिस्सा न्यूक्लियर इंडस्ट्री में खर्च हुआ है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से चीन ने रूस को जिरकोनियम की सप्लाई 300 फीसदी तक बढ़ा दी है। यह ट्रेड उस ऑस्ट्रेलियाई कंपनी के जरिए हो रहा है, जिसमें चीनी निवेशक शामिल हैं। यानी ऑस्ट्रेलिया की धरती से निकला खनिज, चीन के रास्ते रूस तक पहुंच रहा है और अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिमी देशों की ही सुरक्षा रणनीति को कमजोर कर रहा है।

चीनी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी के एक पेपर में स्वीकार किया गया है कि “जिरकोनियम की सतत सप्लाई हमारी सैन्य तकनीकी प्रगति के लिए अत्यंत जरूरी है।” यह साफ दिखाता है कि चीन इस खनिज को सिर्फ औद्योगिक संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार के रूप में देख रहा है।

यह पूरा मामला अब सिर्फ मिनरल एक्सपोर्ट या ट्रेड का नहीं रहा। यह एक ऐसी जियोस्ट्रैटेजिक पावर गेम बन गया है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया की धरती, चीन की कंपनियां, रूस का युद्ध और अमेरिका की चिंताएं — सब एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। जिरकोनियम अब सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि 21वीं सदी की भू-राजनीतिक दौड़ का छिपा हुआ हथियार बन गया है।

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