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UCC पर कांग्रेस की ‘ना’ क्यों? जानिए विरोध के पीछे क्या है पार्टी का तर्क

समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर देश की राजनीति में बहस तेज है। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से इसे अपने प्रमुख एजेंडे में शामिल करती रही है और बीजेपी शासित राज्यों में इसे लागू करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। वहीं, कांग्रेस ने UCC को लेकर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि व्यक्तिगत कानूनों में सुधार जरूरी हो सकता है, लेकिन इसके लिए संबंधित समुदायों की भागीदारी और सहमति जरूरी है। पार्टी व्यापक सहमति के बिना UCC लागू किए जाने का विरोध करती है।

कांग्रेस अपने रुख के समर्थन में 21वें विधि आयोग की 2018 की रिपोर्ट का हवाला देती है। आयोग ने उस समय कहा था कि मौजूदा परिस्थितियों में समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। आयोग ने व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों को दूर करने और उनमें सुधार की जरूरत पर जोर दिया था। यानी आयोग का जोर हर समुदाय के कानून को पूरी तरह एक जैसा बनाने के बजाय उन प्रावधानों में सुधार पर था, जिनसे भेदभाव पैदा होता है।

कांग्रेस का कहना है कि व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव संबंधित समुदायों की भागीदारी और सहमति के साथ होना चाहिए। पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए जारी अपने घोषणापत्र ‘न्याय पत्र’ में भी व्यक्तिगत कानूनों में सुधार को प्रोत्साहित करने की बात कही थी। कांग्रेस के अनुसार ऐसे सुधार संबंधित समुदायों की भागीदारी और सहमति से किए जाने चाहिए। पार्टी ने अपने घोषणापत्र में UCC को सीधे तौर पर लागू करने का वादा नहीं किया था, बल्कि व्यक्तिगत कानूनों में समुदाय आधारित सुधार की बात रखी थी।

कांग्रेस का एक प्रमुख तर्क यह भी है कि भारत में अलग-अलग धर्मों के भीतर भी कई समुदाय, जनजातियां और क्षेत्रीय परंपराएं मौजूद हैं। इनकी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्थाएं एक-दूसरे से अलग हो सकती हैं। ऐसे में पूरे देश के लिए एक समान नागरिक कानून तैयार करना व्यावहारिक चुनौती हो सकता है। कांग्रेस का कहना है कि सुधार की प्रक्रिया में इन विविधताओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

पार्टी यह भी कहती रही है कि अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी परंपराओं, भाषा, खान-पान और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मामलों में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, जब तक कि किसी प्रावधान से मौलिक अधिकारों या समानता के सिद्धांत का उल्लंघन न हो। कांग्रेस व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप करने वाले कानूनों को हटाने की बात भी करती है।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता शकील अहमद खान ने UCC को लेकर बीजेपी पर राजनीतिक मुद्दों से ध्यान भटकाने और ध्रुवीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया है। हालांकि यह कांग्रेस नेता का राजनीतिक आरोप है, जिसे पार्टी के दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए। कांग्रेस का व्यापक तर्क है कि UCC जैसे संवेदनशील विषय पर जल्दबाजी के बजाय व्यापक सार्वजनिक चर्चा और सहमति की जरूरत है।

कांग्रेस संविधान के अनुच्छेद 44 का भी उल्लेख करती है, जिसमें राज्य के लिए पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है। पार्टी का कहना है कि इस प्रावधान को लागू करने की प्रक्रिया में सामाजिक विविधता और व्यापक सहमति को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

उत्तराखंड में लागू किए गए UCC को लेकर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं और इसे लेकर कानून की प्रक्रिया तथा प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। कांग्रेस का आरोप है कि UCC को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। दूसरी ओर, बीजेपी UCC को समान नागरिक अधिकारों और कानून के सामने समानता से जोड़कर देखती है।

कुल मिलाकर कांग्रेस का रुख पूर्ण समान नागरिक संहिता के समर्थन के बजाय व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का है। पार्टी सुधारों के खिलाफ नहीं है, लेकिन उसका तर्क है कि ऐसे बदलाव संबंधित समुदायों की भागीदारी, संवैधानिक अधिकारों और व्यापक सामाजिक सहमति को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए। यही वजह है कि UCC को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक और वैचारिक मतभेद लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं।

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