धर्म बांधता नहीं, मुक्त करता है… मोहन भागवत ने बताया Religion और धर्म में क्या है अंतर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म और रिलीजन के बीच अंतर को समझाते हुए कहा है कि दोनों को एक ही अर्थ में देखना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर धर्म को अंग्रेजी के ‘Religion’ शब्द के समान समझ लिया जाता है, जबकि धर्म का दायरा इससे कहीं व्यापक है। भागवत के मुताबिक, धर्म इंसान के अस्तित्व और सृष्टि के शाश्वत नियमों से जुड़ा हुआ है, जबकि रिलीजन किसी विशेष मत, पंथ या धार्मिक परंपरा से संबंधित हो सकता है।
मोहन भागवत शुक्रवार को मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित ‘युवा धर्म संसद-2026’ को संबोधित कर रहे थे। सेवाज्ञ संस्थानम् की ओर से 17 से 19 सितंबर तक गीता भवन में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इसमें देश के 24 से अधिक राज्यों से करीब 1600 से 1700 युवा, छात्र, शिक्षक और धर्माचार्य शामिल हुए हैं। भागवत मध्य प्रदेश के दो दिवसीय दौरे पर हैं और इसी दौरान उन्होंने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर हिस्सा लिया।
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि धर्म को केवल बुढ़ापे या किसी विशेष धार्मिक आस्था से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म अस्तित्व के प्रारंभ से लेकर उसके अंत तक बना रहता है। उनके अनुसार, व्यक्ति धर्म को माने या न माने, सृष्टि का संचालन अपने नियमों के अनुसार होता है। उन्होंने कहा कि धर्म को समझने के लिए व्यक्ति को अपने मन में बनी पूर्व धारणाओं से बाहर निकलना होगा।
मोहन भागवत ने कहा कि धर्म इंसान को बांधने के बजाय उसे मुक्त करता है। उन्होंने रिलीजन शब्द के अर्थ की चर्चा करते हुए कहा कि यह ‘Religo’ से आया है, जिसका अर्थ बांधना या किसी अनुशासन में रखना बताया जाता है। इसके विपरीत धर्म का उद्देश्य व्यक्ति को उसके कर्तव्यों और अस्तित्व के सत्य को समझाते हुए मुक्ति की ओर ले जाना है।
भागवत ने कहा कि जब रिलीजन धर्म के अनुरूप चलता है तो वह मनुष्य को मुक्ति की दिशा में ले जा सकता है, लेकिन जब रिलीजन धर्म से अलग होकर चलता है तो उसके कारण सांप्रदायिक संघर्ष और धर्म के नाम पर अत्याचार जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि लोगों के मन में बनी यह धारणा बदलनी चाहिए कि ‘रिलीजन ही धर्म है।’
RSS प्रमुख ने अपने संबोधन में महाभारत के अंत में आने वाले पांच श्लोकों का भी उल्लेख किया, जिन्हें ‘भारत सावित्री’ कहा जाता है। उन्होंने धर्म को सभी सुखों का कारण बताते हुए कहा कि धर्म किसी एक समुदाय या परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध जीवन और अस्तित्व के मूल सिद्धांतों से है।
उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद-2026 में देशभर से आए युवाओं और धर्माचार्यों के बीच भागवत का यह संबोधन धर्म, रिलीजन और भारतीय चिंतन पर केंद्रित रहा। उन्होंने धर्म को व्यापक और शाश्वत अवधारणा बताते हुए इसे किसी एक मत या पंथ तक सीमित न रखने की बात कही।