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आचार्य सत्येंद्र दास को सरयू में ‘जल समाधि’, आखिर संतों का दाह संस्कार क्यों नहीं किया जाता ?

आचार्य सत्येंद्र दास को सरयू में ‘जल समाधि’, आखिर संतों का दाह संस्कार क्यों नहीं किया जाता ?

अयोध्या में स्थित राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी महंत सत्येंद्र दास का बुधवार को निधन हो गया। गुरुवार की शाम उन्हें सरयू नदी में जल समाधि दी गई। तुलसीदास घाट पर उनके पार्थिव शरीर को विधि-विधान से जल समाधि दी गई। इससे पहले, उनके पार्थिव शरीर को एक रथ पर रखकर नगर भ्रमण कराया गया, जिसके बाद संत परंपरा के अनुसार उन्हें जल समाधि दी गई।

अब सवाल उठता है कि साधु-संतों को जल समाधि क्यों दी जाती है और उनका दाह संस्कार क्यों नहीं किया जाता?

सनातन धर्म में अंतिम संस्कार की कई विधियां प्रचलित हैं, जिनमें साधु-संतों के लिए जल समाधि एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। इसमें संत के पार्थिव शरीर को बिना अग्नि संस्कार के सीधे नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। जल समाधि के दौरान शरीर के साथ भारी पत्थर बांधे जाते हैं ताकि वह नदी की गहराई में समा जाए।

इसके अलावा, संतों के लिए भू-समाधि की परंपरा भी प्रचलित है। इसमें पार्थिव शरीर को पद्मासन या सिद्धासन की मुद्रा में बिठाकर भूमि में समाधिस्थ कर दिया जाता है। यह मान्यता है कि संतों का शरीर पवित्र होता है और वे अपने जीवनकाल में सांसारिक बंधनों से मुक्त हो चुके होते हैं, इसलिए उन्हें अग्नि संस्कार देने की बजाय जल या भू-समाधि दी जाती है

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