मुख्य सामग्री पर जाएं
ब्रेकिंग न्यूज़
गोरखपुर-वाराणसी समेत 4 शहरों में भारत टैक्सी की शुरुआत, योगी सरकार ने शुरू किया नया मॉडल योगी सरकार ने बिजली विभाग को दिए सख्त निर्देश, त्योहारों में निर्बाध आपूर्ति का बनाया प्लान राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस: तीन और आरोपियों की जमानत खारिज, टिन्नू यादव की याचिका पर आज सुनवाई राज्यसभा चुनाव से पहले BJP की नई रणनीति, यूपी में बदलेंगे ज्यादातर चेहरे, जातीय समीकरण रहेगा कायम ‘पैसे मांगे तो जेल में सड़ना पड़ेगा’, शिक्षकों को नियुक्ति पत्र देते समय CM योगी की सख्त चेतावनी क्या दूसरे राज्यों में भी दिख रहा योगी मॉडल? बिहार के जमुई कांड से कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल योगी सरकार का जॉब कैलेंडर ऑन! 4 दिन में 5,297 युवाओं को मिली सरकारी नौकरी CM योगी देंगे 818 युवाओं को नियुक्ति पत्र, स्वास्थ्य से आयुष तक इन पदों पर मिलेगी नौकरी अमित शाह करेंगे यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो का उद्घाटन, 25 सितंबर से शुरू होगा बड़ा आयोजन ‘बंदूक की राजनीति अब नहीं चलेगी’, मेरठ में सीएम योगी का सपा-कांग्रेस पर बड़ा हमला

यूपी की 84 साल पुरानी हवाई पट्टी में फिर जान, इमरजेंसी लैंडिंग के लिए तैयार

यूपी की 84 साल पुरानी हवाई पट्टी में फिर जान, इमरजेंसी लैंडिंग के लिए तैयार

गाजीपुर जनपद के अंधऊ गांव में स्थित एक ऐतिहासिक हवाई पट्टी का निर्माण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन द्वारा कराया गया था। करीब 63 एकड़ क्षेत्रफल में फैली इस हवाई पट्टी का निर्माण उस समय की सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया गया था। युद्ध के दौरान सैनिकों को राशन और जरूरी सामग्री पहुंचाने तथा इमरजेंसी स्थिति में विमानों की लैंडिंग के उद्देश्य से इसका इस्तेमाल किया गया। हालांकि अब तक यहां किसी फाइटर प्लेन की लैंडिंग नहीं हुई है, लेकिन छोटे विमान और हेलीकॉप्टर यहां नियमित रूप से उतरते हैं।

जानकारों के अनुसार, यह हवाई पट्टी उस समय बनाई गई थी जब जापान भारत के कई हिस्सों पर हमला कर रहा था। बर्मा, जो भारत के पड़ोसी देश है, वहां से जापानी हमले की आशंका को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने रणनीतिक दृष्टिकोण से इस क्षेत्र में दो हवाई पट्टियों का निर्माण कराया—एक अंधऊ गांव में और दूसरी मोहम्मदाबाद तहसील के गौसपुर गांव में। नेपाल और गोरखपुर एयरबेस की निकटता भी इस स्थान की महत्ता को बढ़ाती थी।

लेखक और इतिहासकार उबैदुर रहमान बताते हैं कि यह हवाई पट्टी 1941-42 के आसपास बनाई गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इसी हवाई पट्टी का इस्तेमाल स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा ब्रिटिश सरकार के अनाज और सामग्री को लूटने के लिए भी किया गया था। आजादी के बाद यह हवाई पट्टी छोटे विमानों और हेलीकॉप्टरों की लैंडिंग के लिए उपयोग में लाई जाती रही है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह हवाई पट्टी महत्वपूर्ण रही है। मऊ, बलिया और बिहार की राजनीति से जुड़े कई नेता इसी हवाई पट्टी से हेलीकॉप्टर या छोटे विमानों द्वारा पहुंचते रहे हैं। चुनावी समय में बड़े राजनीतिक नेताओं की आवाजाही भी यहीं से होती है।

पूर्व सांसद मनोज सिन्हा ने इस हवाई पट्टी को और अधिक विकसित करने की योजना बनाई थी, लेकिन चुनाव में हार के बाद उस पर काम नहीं हो सका। बाद में राज्यसभा सांसद डॉ. संगीता बलवंत ने भी इसे लेकर संसद में आवाज उठाई थी, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है।

द्वितीय विश्व युद्ध की इस विरासत को आज एक आधुनिक हवाई अड्डे में बदलने की आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि इसका समुचित उपयोग हो सके और यह पूर्वांचल की हवाई सेवाओं के विस्तार में योगदान दे सके।

Share
अगला लेख → गोरखपुर चिड़ियाघर में एक महीने के भीतर बाघ समेत 4 जानवरों की…

टिप्पणी करें

Your email address will not be published. Required fields are marked *