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ईरान-अमेरिका सीजफायर में पाकिस्तान की क्या भूमिका? संदेशवाहक बनकर निभाई अहम कड़ी

ईरान-अमेरिका सीजफायर में पाकिस्तान की क्या भूमिका? संदेशवाहक बनकर निभाई अहम कड़ी

अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्ध विराम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है, और इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची दोनों ने ही अपने बयानों में पाकिस्तान का जिक्र किया है, जिसके बाद यह मुद्दा और चर्चा में आ गया है कि आखिर इस प्रक्रिया में पाकिस्तान ने क्या भूमिका निभाई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की प्रक्रिया कई चरणों में आगे बढ़ी। 6 अप्रैल को ईरान की ओर से एक 10 सूत्री प्रस्ताव भेजा गया, जिस पर अमेरिकी पक्ष की शुरुआती प्रतिक्रिया नकारात्मक रही। हालांकि, बाद में कूटनीतिक प्रयास तेज हुए और इसमें चीन की भी भूमिका सामने आई, जिसने ईरान को नरमी बरतने की सलाह दी। इसके बाद प्रस्ताव में कुछ संशोधन किए गए, जिनमें अमेरिका द्वारा हमले से परहेज और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने जैसी शर्तें शामिल थीं।

इस संशोधित प्रस्ताव के बाद पाकिस्तान को एक अहम कड़ी के रूप में इस्तेमाल किया गया। पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुंचाने का काम किया। जानकारी के अनुसार, ईरान से जो संदेश पाकिस्तान को मिला, उसे उसने अमेरिकी प्रशासन तक पहुंचाया और अमेरिका का जवाब भी ईरान तक भेजा। इस तरह पाकिस्तान की भूमिका एक ‘मीडिएटर’ से ज्यादा ‘संदेश वाहक’ के रूप में सामने आई।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ने इस समझौते की शर्तें तय करने या उनमें बदलाव कराने में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाई। अमेरिकी पॉलिसी एक्सपर्ट एडम कॉचरान के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने अपने हितों को साधने के लिए पाकिस्तान को इस प्रक्रिया में शामिल किया। उनका कहना है कि अमेरिका किसी भी हाल में संघर्ष को आगे बढ़ने से रोकना चाहता था और पाकिस्तान इस काम के लिए उपयुक्त माध्यम साबित हुआ।

वहीं, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के मिडिल ईस्ट मामलों के विशेषज्ञ कबीर तनेजा का कहना है कि पाकिस्तान के लिए यह भूमिका निभाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। उनकी राय में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति कमजोर है और वह मिडिल ईस्ट में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। साथ ही, वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों को भी बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ होता है कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच सीधे समझौता कराने के बजाय एक संचार माध्यम की भूमिका निभाई। हालांकि उसकी भागीदारी ने उसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है, लेकिन असल फैसले और शर्तें अमेरिका और ईरान के बीच ही तय हुईं।

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