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“दुनिया को रास्ता दिखाएगा भारत”: RSS प्रमुख मोहन भागवत

“दुनिया को रास्ता दिखाएगा भारत”: RSS प्रमुख मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने त्रिपुरा के मोहनपुर में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान वैश्विक व्यवस्था, विज्ञान और धर्म को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पिछले लगभग 2000 वर्षों में शासन, धर्म और विज्ञान के विभिन्न प्रयोग किए गए, लेकिन इसके बावजूद दुनिया को स्थायी शांति और संतोष नहीं मिल पाया। उनके अनुसार अब विश्व समुदाय भारत के पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक मूल्यों की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।

मां सौंदर्य चिन्मयी मंदिर के प्रतिष्ठा और कुंभाभिषेक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि इतिहास में पहले सत्ता राजाओं को सौंपी गई, लेकिन समय के साथ कई शासक जनता के शोषक बन गए। इसके बाद धर्म को सर्वोच्च मानकर समाज को दिशा देने की कोशिश हुई, लेकिन इससे भी संघर्ष और हिंसा पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। उन्होंने कहा कि विज्ञान के विकास ने इंसान को सुविधाएं तो दीं, लेकिन जीवन में संतोष और शांति अब भी अधूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि आज के दौर में विकास तेजी से हो रहा है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है, परिवार टूट रहे हैं और समाज में अपराध बढ़ रहे हैं। वैश्विक स्तर पर युद्ध और तनाव भी लगातार बने हुए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि केवल भौतिक प्रगति से मानवता की समस्याओं का समाधान संभव नहीं है।

मोहन भागवत ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को उसकी सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि यहां अलग-अलग धर्म, भाषाएं और परंपराएं होते हुए भी एकता बनी हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि कुछ ताकतें समाज में धार्मिक और भाषाई आधार पर विभाजन पैदा करने की कोशिश कर रही हैं, जिन्हें पहचानकर नाकाम करना जरूरी है। उन्होंने लोगों से एकजुट रहने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया।

अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में केवल सही होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शक्ति का होना भी आवश्यक है। इसलिए समाज को ज्ञान के साथ-साथ सामर्थ्य भी अर्जित करनी चाहिए, ताकि वह अपने मूल्यों की रक्षा कर सके और दुनिया को सही दिशा दिखा सके।

कार्यक्रम में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक शाह समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। इस दौरान मोहन भागवत ने यह भी कहा कि मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक जागरूकता और ज्ञान के प्रसार के भी महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं।

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