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ब्रिटिश दौर का ‘गवर्नर हाउस’ अब लोकभवन: केंद्र सरकार ने बदला देशभर का ढांचा

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भारत में राज्यपालों के सरकारी आवासों का नाम ‘राजभवन’ से बदलकर ‘लोकभवन’ करने की प्रक्रिया तेज़ हो चुकी है। केंद्र सरकार का कहना है कि यह बदलाव महज़ नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक कदम है, जिसका उद्देश्य इन भवनों को जनता के और अधिक करीब लाना है। सरकार का मानना है कि ‘राजभवन’ शब्द में औपनिवेशिक दौर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है, जबकि ‘लोकभवन’ नाम अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी प्रतीक पेश करता है।

इस परिवर्तन की शुरुआत पश्चिम बंगाल से हुई, जहां कोलकाता और दार्जिलिंग के राजभवन का नाम बदल दिया गया। इसके बाद यह प्रक्रिया देशभर में लागू की गई। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 25 नवंबर 2025 को एक आधिकारिक आदेश जारी किया, जिसके बाद राज्यपालों ने अधिसूचना जारी कर नाम परिवर्तन को लागू करना शुरू कर दिया। अब तक आठ राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, उत्तराखंड, ओडिशा, गुजरात और त्रिपुरा—ने यह बदलाव लागू कर दिया है। इसके साथ ही लद्दाख में उपराज्यपाल के आवास का नाम ‘लोक निवास’ रखा गया है। बाकी राज्यों में प्रक्रिया जारी है।

हालांकि आमतौर पर माना जाता है कि आज़ादी के बाद सी. राजगोपालाचारी ने ‘गवर्नर हाउस’ का नाम बदलकर ‘राजभवन’ रखा था, लेकिन इस दावे का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। संविधान में भी ‘राजभवन’ शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। दस्तावेज़ों में इसे केवल ‘राज्यपाल का आधिकारिक निवास’ कहा गया है। इसलिए ‘लोकभवन’ नामकरण पूरी तरह से प्रशासनिक निर्णय है, संवैधानिक नहीं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अधिकार न तो राज्य सरकारों के पास है और न ही यह राज्यपालों का स्वतंत्र निर्णय है। राज्यपाल केंद्र द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, और यह पूरा बदलाव केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर लागू किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में राज्य विधानसभाओं की सहमति भी आवश्यक नहीं मानी गई, क्योंकि यह विधायी विषय नहीं है। यदि कोई राज्यपाल निर्देश लागू न करे, तो इसे मंत्रालय के आदेश का उल्लंघन माना जाएगा, और उस स्थिति में केंद्र सरकार स्पष्टीकरण मांग सकती है या कार्रवाई की अनुशंसा कर सकती है।

इस बदलाव के बाद राजभवनों में कई व्यावहारिक परिवर्तन भी होंगे—जैसे सभी सूचनापट, बोर्ड, सरकारी अभिलेख, वेबसाइट, और दस्तावेज़ में नया नाम अपडेट करना होगा। अनुमान है कि इस पर आने वाला खर्च बहुत मामूली होगा और सामान्य प्रशासनिक खर्चों में समाहित किया जाएगा।

स्वतंत्रता के बाद पहली बार इतने व्यापक स्तर पर राजभवनों के नाम बदले जा रहे हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार ऐतिहासिक भवनों को नई पहचान देने की दिशा में स्पष्ट रूप से आगे बढ़ चुकी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में जनता इस परिवर्तन को किस तरह स्वीकार करती है और इसका क्या सांस्कृतिक प्रभाव पड़ता है।

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