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ग्राउंड जीरो फिल्म की समीक्षा: इमरान हाशमी ने सही समय पर एक छुपे हुए नायक को उजागर किया

इमरान हाशमी दो साल बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर चुके हैं। सलमान खान की ‘टाइगर 3’ (2023) में खलनायक की भूमिका निभाने के बाद अब वह ‘ग्राउंड जीरो’ में सीमा सुरक्षा बल (BSF) अधिकारी नरेंद्र नाथ धर दुबे का किरदार निभा रहे हैं। यह फिल्म समय के हिसाब से सही समय पर रिलीज हुई है, खासकर जब देश में पहललगाम आतंकवादी हमले को लेकर गुस्सा है। ‘ग्राउंड जीरो’ एक ऐसी फिल्म है जो इतिहास को दोहराने के लिए दर्शकों को मजबूर करेगी। यह फिल्म वास्तविक जीवन की एक घटना पर आधारित है और इसे कश्मीर की धरती पर शूट किया गया है, जो इसे और भी प्रासंगिक और प्रभावशाली बनाता है।

कहानी
फिल्म की कहानी अगस्त 2001 में श्रीनगर से शुरू होती है, जहां कश्मीरी आतंकवादी छोटे लड़कों को अपने जाल में फंसाकर उन्हें बंदूकें थमा देते हैं। ये लड़के पैसे और अपने परिवारों की सुरक्षा की चाह में आतंकवादियों के हाथों में खेलते हैं। इसके बाद करीब 70 सैनिकों को इन आतंकवादियों द्वारा कायरतापूर्वक मारा जाता है। BSF अधिकारी नरेंद्र नाथ धर दुबे (इमरान हाशमी) शहर लौटते हैं और एक ऑपरेशन के दौरान गाजी बाबा को पकड़ने की कोशिश करते हैं, जिससे उन्हें पता चलता है कि गाजी ही दिल्ली संसद हमले और अक्षरधाम मंदिर हमले का मास्टरमाइंड था। फिल्म के दूसरे हिस्से में तनाव और भी बढ़ जाता है, लेकिन नरेंद्र का दृढ़ संकल्प और उनकी टीम का उन पर विश्वास अंत तक कायम रहता है। वह अपनी जान की बाजी लगाकर जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों से मुकाबला करते हैं और गाजी बाबा को खत्म करने में सफल होते हैं।

लेखन और निर्देशन
‘ग्राउंड जीरो’ कश्मीर में तैनात सैनिकों के साहस और दृढ़ संकल्प को सलाम करती है। कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके में जहां आतंकवाद अपने चरम पर है और सेना के जवानों पर लगातार हमले हो रहे हैं, वहां सैनिकों का संघर्ष निरंतर जारी रहता है। फिल्म हमें एक गुमनाम नायक की कहानी दिखाती है, जो देश के लिए अपनी जान जोखिम में डालता है। फिल्म की घटनाओं को बहुत अच्छे तरीके से क्रमबद्ध किया गया है और कश्मीरी लहजे तथा स्थानीय स्थानों का प्रभावी उपयोग किया गया है। हालांकि, संवादों की कमी महसूस होती है। फिल्म में देशभक्ति से जुड़े प्रभावी संवाद और भावनात्मक गाने नहीं हैं। केवल एक संवाद है, ‘पहरेदारी बहुत हो गई अब प्रहार होगा’, जो खासा प्रभाव डालता है, लेकिन इसके अलावा कोई संवाद दिल छूने वाला नहीं है।

अभिनय
‘ग्राउंड जीरो’ में सभी अभिनेता अपनी भूमिकाओं में सटीक फिट बैठते हैं। इमरान हाशमी ने फिर से साबित किया है कि वह अपनी भूमिकाओं में पूरी तरह से ढल जाते हैं। ‘टाइगर 3’, ‘ऐ वतन मेरे वतन’, और अब ‘ग्राउंड जीरो’ जैसी फिल्मों में इमरान ने अलग-अलग किरदार निभाए हैं, जो उनके अभिनय की विविधता को दर्शाते हैं। जोया हुसैन ने इमरान के साथ अच्छा काम किया है, लेकिन इमरान की ऑन-स्क्रीन पत्नी, सई तम्हाणकर का अभिनय कुछ खास नहीं रहा। उनके और इमरान के बीच केमिस्ट्री में कमी महसूस होती है, जिससे उनका किरदार प्रभावी नहीं बन पाता।

फैसला
कुल मिलाकर, ‘ग्राउंड जीरो’ एक अच्छी फिल्म है जिसमें कुछ उतार-चढ़ाव हैं। यह कश्मीरी दृष्टिकोण को सामने लाती है और वर्तमान समय में इसकी सख्त जरूरत है। फिल्म ने अच्छे निर्देशन और प्रामाणिक चित्रण के साथ अपनी जगह बनाई है। इसे 5 में से 3 स्टार मिलते हैं।

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