पंजाब की राजनीति में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया जब अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को धार्मिक कदाचार का दोषी घोषित कर दिया। यह फैसला एक कथित वायरल वीडियो के आधार पर लिया गया है, जिसमें मुख्यमंत्री पर सिख गुरुओं के चित्रों पर शराब छिड़कने का आरोप लगाया गया है। अकाल तख्त ने इस मामले को गंभीर मानते हुए भगवंत मान को “गुरु दोखी” और “खालसा पंथ विरोधी” करार दिया है।
अकाल तख्त की ओर से जारी बयान में कहा गया कि मामले की जांच के लिए दो सरकारी मान्यता प्राप्त फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की रिपोर्टों का अध्ययन किया गया। रिपोर्टों के अनुसार संबंधित वीडियो में किसी प्रकार की कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का इस्तेमाल या तकनीकी छेड़छाड़ नहीं पाई गई। इसके आधार पर अकाल तख्त ने मुख्यमंत्री के खिलाफ धार्मिक कदाचार का फैसला सुनाया।
इस मामले के साथ ही अकाल तख्त ने पंजाब सरकार द्वारा पारित जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 के कुछ प्रावधानों पर भी आपत्ति जताई है। जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने इस कानून को पहले भी “काला कानून” बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की थी। अकाल तख्त ने घोषणा की है कि पंजाब के सभी सिख विधायक, चाहे वे किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े हों, तथा राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य 29 जून को अकाल तख्त के समक्ष पेश होंगे।
यह पहली बार नहीं है जब मुख्यमंत्री भगवंत मान को अकाल तख्त के समक्ष जवाब देना पड़ा हो। इससे पहले जनवरी में भी उन्हें सिख मर्यादाओं को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामले में तलब किया गया था। पंजाब के राजनीतिक इतिहास में भगवंत मान ऐसे तीसरे मुख्यमंत्री बने हैं जिन्हें अकाल तख्त द्वारा धार्मिक कदाचार के मामले में दोषी ठहराया गया है। इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और सुरजीत सिंह बरनाला भी ऐसे मामलों में अकाल तख्त के समक्ष पेश हो चुके हैं।
अकाल तख्त के इस फैसले के बाद पंजाब की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की मांग उठाई है। कांग्रेस नेता और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से सवाल किया कि क्या वह इस मामले में भगवंत मान से मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए कहेंगे।
फिलहाल आम आदमी पार्टी की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि अकाल तख्त के फैसले और विपक्ष के बढ़ते दबाव के बाद यह मामला पंजाब की राजनीति में आने वाले दिनों में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धार्मिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर इस विवाद का असर राज्य की सियासत पर दिखाई दे सकता है।
अब सभी की नजरें 29 जून को होने वाली पेशी और इस मामले में आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। अकाल तख्त के फैसले के बाद यह मुद्दा केवल धार्मिक दायरे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पंजाब की राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण बहस का केंद्र बन गया है।

