पंजाब की राजनीति में इन दिनों पंथक मुद्दे एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं। धार्मिक और सामाजिक प्रभाव रखने वाले श्री अकाल तख्त के हालिया रुख ने राज्य की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले पंथक राजनीति के समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है और इसका सीधा असर विभिन्न दलों के वोट बैंक पर पड़ सकता है।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल दोनों अलग-अलग विवादों को लेकर चर्चा में हैं। ऐसे में धार्मिक संस्थाओं और जत्थेदारों के बयानों को राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पंजाब की राजनीति में पंथक मुद्दों का हमेशा से गहरा प्रभाव रहा है और चुनावी माहौल में इनकी अहमियत और बढ़ जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बड़ी संख्या में पंथक मतदाताओं का समर्थन हासिल किया था। पार्टी ने विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों के साथ-साथ धार्मिक और सामाजिक विषयों पर भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की। हालांकि हाल के घटनाक्रमों के बाद पार्टी के सामने अपने पारंपरिक और पंथक समर्थकों का भरोसा बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो सकती है।
राजनीतिक मामलों के जानकार हरबंस सिंह का मानना है कि पंजाब में सिख आबादी का एक बड़ा वर्ग धार्मिक और पंथक मुद्दों को गंभीरता से लेता है। ऐसे में श्री अकाल तख्त से जुड़े किसी भी फैसले या संदेश का प्रभाव सीधे तौर पर पंथक वोट बैंक पर पड़ सकता है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में राजनीतिक दलों को अपनी रणनीतियों में बदलाव करना पड़ सकता है।
दूसरी ओर, शिरोमणि अकाली दल भी अपनी पारंपरिक पंथक पहचान को मजबूत करने की कोशिश में जुटा हुआ है। राजनीतिक विश्लेषक परमजीत सिंह के अनुसार, अकाली दल लंबे समय से पंजाब की सबसे बड़ी पंथक पार्टी माना जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसका परंपरागत वोट बैंक कमजोर हुआ है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने संगतों और समर्थकों का विश्वास दोबारा जीतने की चुनौती है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस भी राजनीतिक अवसर तलाश रही हैं। दोनों दल पंथक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि पारंपरिक पंथक वोट बैंक में किसी तरह का बदलाव आता है, तो इसका लाभ लेने के लिए भाजपा और कांग्रेस पूरी ताकत लगाएंगी।
दरअसल, 15 जून को श्री अकाल तख्त में आयोजित एक विशेष सभा के दौरान एक कथित विवादित वीडियो के संदर्भ में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान को लेकर हुक्मनामा जारी किया गया था। इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति में बहस तेज हो गई। हालांकि मुख्यमंत्री मान ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए उन्हें निराधार बताया है।
वहीं, इससे पहले 11 जून को श्री अकाल तख्त के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी रघुबीर सिंह ने एक मामले में सुखबीर सिंह बादल का नाम लिया था। उन्होंने कथित बेअदबी से जुड़े मामले में एसआईटी के समक्ष बयान देते हुए कुछ महत्वपूर्ण दावे किए थे। इसके बाद यह मुद्दा भी राजनीतिक और धार्मिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया।
पंजाब की राजनीति में पंथक मुद्दों का प्रभाव हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में धार्मिक संस्थाओं के फैसलों, राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं और पंथक मतदाताओं के रुख पर आने वाले दिनों में सभी की नजरें टिकी रहेंगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले यह पूरा घटनाक्रम राज्य की राजनीति की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित कर सकता है।

