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प्रयागराज: महाकुंभ से नागा साधु इस दिन वापस लौटेंगे, फिर इतने वर्षों बाद यहां नजर आएंगे

2025 का महाकुंभ मेला 13 जनवरी से शुरू हो चुका है और इसका समापन 26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि के दिन होगा। 26 फरवरी के बाद अगले कुंभ तक आपको नागा साधु दिखाई नहीं देंगे। महाकुंभ के समापन के बाद ये साधु अपने-अपने अखाड़ों में लौट जाते हैं। प्रयागराज के बाद अगला कुंभ 2027 में नासिक में गोदावरी नदी के किनारे आयोजित होगा, जहां पिछला कुंभ 2015 में हुआ था।

भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थित अखाड़ों में नागा साधु ध्यान, साधना और धार्मिक शिक्षा का अभ्यास करते हैं। कुछ साधु काशी (वाराणसी), हरिद्वार, ऋषिकेश, उज्जैन और प्रयागराज जैसे प्रमुख तीर्थ स्थानों पर भी निवास करते हैं।

कुंभ मेला में आमतौर पर दो प्रमुख अखाड़ों के नागा साधु हिस्सा लेते हैं। एक है वाराणसी का महापरिनिर्वाण अखाड़ा और दूसरा है पंच दशनाम जूना अखाड़ा। ये साधु कुंभ मेला में भाग लेते हैं और शरीर पर भस्म, रुद्राक्ष की माला, त्रिशूल और कभी-कभी जानवरों की खाल लपेटकर आते हैं।

पहला शाही स्नान नागा साधु करते हैं, जिसके बाद अन्य श्रद्धालुओं को स्नान की अनुमति मिलती है। कुंभ के दौरान साधु दिगंबर स्वरूप में रहते हैं, लेकिन बाद में गमछा पहनकर आश्रमों में रहते हैं। दिगंबर का अर्थ होता है ‘धरती और आकाश’, और नागा साधु मानते हैं कि धरती उनका बिछौना और आकाश उनका ओढ़ना है, इसीलिए वे कुंभ में नागा रूप में आते हैं।

कुंभ के समाप्त होने के बाद नागा साधु अपने-अपने अखाड़ों में लौटकर ध्यान, साधना और धार्मिक शिक्षा का अभ्यास करते हैं। कई साधु हिमालय में तपस्या करने जाते हैं और वहां कठोर तप करते हैं, अपनी जीविका के लिए फल और फूलों पर निर्भर रहते हैं।

कुंभ मेला कहां और कब लगता है?

  • प्रयागराज: जब सूर्य मकर राशि में और गुरु वृष राशि में होते हैं, तब गंगा, यमुन और अदृश्य सरस्वती नदी के संगम पर महाकुंभ होता है।
  • हरिद्वार: जब कुंभ राशि में गुरु और मेष राशि में सूर्य होते हैं, तब गंगा के किनारे कुंभ मेला आयोजित होता है।
  • नासिक: जब गुरु और सूर्य सिंह राशि में होते हैं, तब गोदावरी नदी के तट पर कुंभ मेला लगता है।
  • उज्जैन: जब गुरु सिंह राशि में और सूर्य मेष राशि में होते हैं, तब कुंभ मेला क्षिप्रा नदी के तट पर आयोजित होता है।
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