भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बिना किसी मुख्यमंत्री चेहरे के 27 साल बाद दिल्ली की सत्ता में वापसी कर ली है। इस जीत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव का नतीजा माना जा रहा है, लेकिन इसके पीछे कुछ ऐसे रणनीतिकार भी थे, जिन्होंने महीनों तक मेहनत कर पार्टी की जीत सुनिश्चित की। ये पांच नेता चुपचाप अपनी रणनीति पर काम कर रहे थे, जिन्होंने न सिर्फ आम आदमी पार्टी (AAP) के नैरेटिव को कमजोर किया, बल्कि बीजेपी के लिए ज़मीन पर मजबूत पकड़ भी बनाई।
इन नेताओं ने टिकट वितरण के समय पार्टी में असंतोष को संभालने से लेकर विरोधी खेमे में सेंध लगाने तक कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। अब जब बीजेपी ने दिल्ली फतह कर ली है, तो इन नेताओं की चर्चा सियासी गलियारों में जोरों पर है। आइए जानते हैं कौन हैं वे पांच चेहरे, जिन्होंने पर्दे के पीछे से इस जीत की नींव रखी।
1. बैजयंत पांडा – चुनावी रणनीति के मास्टरमाइंड
अक्टूबर 2024 में बैजयंत पांडा को दिल्ली विधानसभा चुनाव का प्रभारी नियुक्त किया गया था। इसके बाद से ही वे रणनीतिक रूप से बीजेपी की जीत का खाका तैयार कर रहे थे। टिकट बंटवारे के बाद उपजे असंतोष को उन्होंने बखूबी संभाला और आम आदमी पार्टी के विधायकों को चुनाव से ठीक पहले तोड़ने में भी सफल रहे।
पांडा पहले भी दिल्ली चुनाव के प्रभारी रह चुके हैं, लेकिन बाद में उन्हें उत्तर प्रदेश में नई जिम्मेदारी दे दी गई थी। ओडिशा की राजनीति से आए पांडा कभी मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के करीबी माने जाते थे, लेकिन बाद में अलग हो गए। बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के विश्वासपात्र माने जाने वाले पांडा ने बूथ स्तर पर मैनेजमेंट को मजबूत किया और उन सीटों पर विशेष ध्यान दिया जहां बीजेपी पहले से मजबूत थी।
2. अनुराग ठाकुर – मुस्लिम बहुल इलाकों में अहम रणनीति
पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी इस जीत में अहम भूमिका निभाई। उन्हें खासतौर पर मुस्लिम बहुल सीटों की रणनीति तैयार करने का जिम्मा दिया गया था। करावल नगर, मुस्तफाबाद और आदर्श नगर जैसी सीटों पर उन्होंने विशेष रूप से काम किया।
अनुराग ठाकुर ने डोर-टू-डोर कैंपेन के जरिए हिंदू मतदाताओं को साधने का काम किया। इसका असर यह रहा कि मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद सीट पर भी बीजेपी को जीत मिली। ठाकुर बीजेपी हाईकमान के करीबी नेताओं में शुमार हैं और हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से सांसद हैं। चुनाव प्रचार के दौरान वे लगातार अरविंद केजरीवाल पर हमलावर रहे और उनके खिलाफ माहौल बनाने में सफल रहे।
3. रामवीर बिधूड़ी – घोषणापत्र के जरिए मजबूत पकड़
दक्षिणी दिल्ली के सांसद रामवीर सिंह बिधूड़ी को बीजेपी का घोषणापत्र तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उनकी टीम ने आम नागरिकों से सुझाव लेकर मेनिफेस्टो बनाया, जिसका असर यह हुआ कि आम आदमी पार्टी की ‘मुफ्त योजनाओं’ की रणनीति फीकी पड़ गई।
बीजेपी ने घोषणापत्र में महिलाओं को ₹2500 प्रतिमाह देने का वादा किया, साथ ही झुग्गी-झोपड़ियों के नियमितीकरण जैसे बड़े वादे किए। बिधूड़ी दिल्ली की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं और बदरपुर से विधायक रह चुके हैं। 2020 में उन्हें दिल्ली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी बनाया गया था।
4. मनोज तिवारी – पूर्वांचली वोट बैंक और प्रचार अभियान का नेतृत्व
नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने बीजेपी के लिए प्रचार अभियान को धार दी। उन्होंने न केवल चुनावी गीत तैयार करवाया, बल्कि कई मौकों पर डैमेज कंट्रोल में भी अहम भूमिका निभाई।
तिवारी जिस लोकसभा क्षेत्र से आते हैं, वहां बीजेपी का प्रदर्शन इस बार और बेहतर रहा। नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली की पांच विधानसभा सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की, जबकि पिछले चुनाव में पार्टी को यहां सिर्फ दो सीटें मिली थीं। मनोज तिवारी दिल्ली बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं और पूर्वांचली समुदाय में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।
5. अतुल गर्ग – बूथ मैनेजमेंट और जमीनी स्तर पर प्रचार
गाजियाबाद के सांसद अतुल गर्ग को दिल्ली चुनाव में सह प्रभारी बनाया गया था। वे पर्दे के पीछे रहकर बूथ मैनेजमेंट को मजबूत करने में जुटे रहे। उन्होंने छोटे-छोटे स्तर पर बैठकें कर कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया और पीएम मोदी के संदेश को हर घर तक पहुंचाने का काम किया।
गर्ग गाजियाबाद की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं और सांसद बनने से पहले विधायक भी रह चुके हैं। दिल्ली से सटे होने के कारण उन्होंने एनसीआर के मतदाताओं पर भी ध्यान दिया, जिसका बीजेपी को फायदा मिला।
बीजेपी की इस जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति का बड़ा योगदान रहा, लेकिन इन पांच नेताओं की मेहनत ने चुनाव को बीजेपी के पक्ष में मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्होंने जमीन पर कार्यकर्ताओं को संगठित किया, चुनावी नैरेटिव को मजबूत किया और आम आदमी पार्टी के प्रभाव को कमजोर करने में सफलता हासिल की।

