अन्ना आंदोलन से राजनीति में कदम रखने वाले अरविंद केजरीवाल ने जिस तेजी से सफलता हासिल की थी, अब उतनी ही तेजी से उनकी पकड़ कमजोर होती दिख रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को न केवल सत्ता गंवानी पड़ी, बल्कि खुद अरविंद केजरीवाल भी अपनी सीट नहीं बचा सके। बीते एक हफ्ते में पार्टी को तीन बड़े राजनीतिक झटके लगे हैं, जिनका असर पार्टी की भविष्य की राजनीति पर गहरा पड़ सकता है।
AAP को लगे तीन बड़े झटके
1. चंडीगढ़ मेयर चुनाव में हार
पहला बड़ा झटका आम आदमी पार्टी को चंडीगढ़ में लगा, जहां मेयर चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद AAP अपने प्रत्याशी को जिताने में नाकाम रही। चंडीगढ़ नगर निगम में कुल 35 पार्षद हैं, जिनमें AAP के 13, कांग्रेस के 6 और बीजेपी के 16 पार्षद थे। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी भी इस चुनाव में वोट डालने के पात्र थे, जिससे कुल 36 मतदाता हो गए। जीत के लिए 19 वोटों की जरूरत थी और AAP-कांग्रेस गठबंधन के पास 20 पार्षद थे, फिर भी बीजेपी के उम्मीदवार ने 19 वोट हासिल कर जीत दर्ज कर ली। इस हार का कारण AAP के तीन पार्षदों का क्रॉस वोटिंग करना रहा, जिससे पार्टी के भीतर गहरी नाराजगी और अविश्वास का माहौल बन गया है।
2. दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त
दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP को दूसरा बड़ा झटका लगा। 2015 और 2020 में शानदार जीत दर्ज करने वाली पार्टी इस बार महज 22 सीटों पर सिमट गई। 2015 में AAP ने 67 सीटें जीती थीं, जबकि 2020 में 63 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ और वह सत्ता से बाहर हो गई। दिल्ली में विकास मॉडल के सहारे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करने की पार्टी की योजना को बड़ा झटका लगा है।
3. अरविंद केजरीवाल की व्यक्तिगत हार
तीसरा और सबसे बड़ा झटका खुद अरविंद केजरीवाल की हार रही। नई दिल्ली विधानसभा सीट से बीजेपी के प्रवेश वर्मा ने उन्हें हराया, जिससे न सिर्फ केजरीवाल को बल्कि पूरे AAP संगठन को तगड़ा आघात पहुंचा। सिर्फ केजरीवाल ही नहीं, बल्कि उनके कई प्रमुख साथी भी चुनाव हार गए, जिनमें मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, सोमनाथ भारती, दुर्गेश पाठक, आदिल खान, सत्येंद्र जैन और दिनेश मोहनिया जैसे बड़े नेता शामिल हैं। इससे पार्टी की टॉप लीडरशिप दिल्ली विधानसभा से बाहर हो गई, जिससे AAP की स्थिति और कमजोर हो गई है।
AAP पर आगे क्या असर पड़ेगा?
दिल्ली चुनाव हारने का असर केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एमसीडी और राज्यसभा चुनावों में भी दिखेगा।
- एमसीडी पर असर: दो महीने बाद दिल्ली नगर निगम के मेयर चुनाव होने हैं। बीजेपी ने विधानसभा में बहुमत हासिल कर लिया है, जिससे स्पीकर पद भी उसके पास रहेगा। स्पीकर अपने विवेक से 14 विधायकों को नगर निगम का सदस्य मनोनीत करते हैं, जो परंपरागत रूप से सत्ताधारी पार्टी से होते हैं। ऐसे में अगर बीजेपी अपने विधायकों को मनोनीत करती है, तो AAP का एमसीडी पर नियंत्रण खत्म हो जाएगा और बीजेपी आसानी से अपना मेयर बना लेगी।
- राज्यसभा में नुकसान: दिल्ली से चुने जाने वाले राज्यसभा सदस्यों की संख्या में भी बदलाव आएगा। पहले AAP तीनों सीटों पर जीत दर्ज करती थी, लेकिन अब समीकरण बदल चुके हैं। इस बार AAP को केवल एक सीट मिल सकती है, जबकि दो सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार चुने जाने की संभावना है।
- पंजाब में अनिश्चितता: पंजाब में भी AAP की सरकार पर खतरा मंडरा रहा है। कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने दावा किया है कि AAP के 30 विधायक कांग्रेस के संपर्क में हैं और पार्टी में टूट हो सकती है। अगर ऐसा होता है, तो पंजाब में भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल के बीच सत्ता संघर्ष और बढ़ सकता है।
आम आदमी पार्टी को एक ही हफ्ते में तीन बड़े राजनीतिक झटके लगे हैं—चंडीगढ़ मेयर चुनाव में हार, दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त और अरविंद केजरीवाल की व्यक्तिगत हार। इन झटकों से पार्टी का मनोबल गिरा है और उसकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई है। अब AAP को दिल्ली, पंजाब और अन्य राज्यों में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी।

